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Jinali Mody: केले के रेशे से ‘चमड़ा’ बनाने वाली 28 साल की भारतीय उद्यमी Jinali Mody को United Nations का सम्मान।

Jinali Mody

ज़रा सोचिए… अगर मैं आपसे कहूँ कि जिस केले को हम रोज़ खाते हैं, और उसके तने व डंठल को किसान अक्सर बेकार मानकर खेत में फेंक देते हैं या जला देते हैं, वही चीज़ दुनिया की सबसे प्रदूषण फैलाने वाली इंडस्ट्री को बदलने की ताक़त रखती है, तो क्या आप यकीन करेंगे? अगर मैं कहूँ कि उसी बेकार समझे जाने वाले तने से एक ऐसा चमड़ा बनाया जा सकता है, जो असली चमड़े जैसा दिखता और महसूस होता है, लेकिन उसमें किसी जानवर की जान नहीं जाती और न ही पर्यावरण को नुकसान पहुँचता है, तो आपको यह किसी विज्ञान कथा जैसी बात लगेगी।

लेकिन यह कहानी कोई कल्पना नहीं बल्कि हकीकत है। और इस चमत्कार के पीछे हैं भारत की सिर्फ़ 28 साल की एक युवा महिला उद्यमी—Jinali Mody—जिन्होंने दुनिया को दिखा दिया कि भविष्य का फैशन कैसा होगा। उनकी यह खोज न सिर्फ़ विज्ञान और उद्यमिता का संगम है बल्कि यह इंसान और प्रकृति के बीच संतुलन बनाने की कोशिश भी है। यही कारण है कि United Nations Environment Programme (UNEP) ने उन्हें, 2025 Young Champions of the Earth पुरस्कार देकर सम्मानित किया है। आज हम इसी विषय पर गहराई में चर्चा करेंगे।

आपको बता दें कि जिनाली मोदी की कहानी किसी प्रेरणादायी डॉक्यूमेंट्री से कम नहीं लगती। मुंबई की गलियों से निकलकर येल यूनिवर्सिटी जैसी प्रतिष्ठित जगह तक पहुँचने और फिर वहाँ से लौटकर, भारत की धरती पर खड़ा होकर एक वैश्विक समस्या का समाधान खोज निकालना—यह सफर आसान नहीं था। बचपन से ही उन्हें विज्ञान के प्रति गहरी दिलचस्पी थी। वे जानती थीं कि किताबों और लैब की चारदीवारी से बाहर भी विज्ञान का मकसद होना चाहिए—वो मकसद जो इंसान की ज़िंदगी को बेहतर बनाए और धरती को सुरक्षित रखे।

यही सोच उन्हें सेंट जेवियर्स कॉलेज, मुंबई में बायोकेमिस्ट्री की पढ़ाई तक ले गई और फिर येल स्कूल ऑफ एनवायरनमेंट से मास्टर्स डिग्री दिलाई। येल में रहते हुए उन्होंने देखा कि पूरी दुनिया किस तरह फैशन इंडस्ट्री के पर्यावरणीय बोझ से जूझ रही है। यह इंडस्ट्री अकेले ही कार्बन Emission और पानी की बर्बादी में सबसे ऊपर गिनी जाती है। लाखों पशु हर साल मारे जाते हैं और चमड़ा बनाने की प्रक्रिया में विषैले रसायनों का ढेर सारी नदियों और ज़मीनों को जहरीला कर देता है।

यह सब देखकर जिनाली मोदी के मन में सवाल उठा—क्या फैशन इंडस्ट्री को बदलना संभव है? क्या ऐसा कोई रास्ता हो सकता है, जिसमें सुंदर कपड़े और लग्ज़री प्रोडक्ट्स तो बनें लेकिन धरती को नुकसान न पहुँचे? इसी सवाल ने उनकी ज़िंदगी की दिशा तय कर दी। यहीं से पैदा हुआ Banofi Leather का विचार। भारत में हर साल लाखों टन केले की खेती होती है, लेकिन उसके तने और डंठल बेकार समझे जाते हैं। किसान उन्हें काटकर फेंक देते हैं या जला देते हैं।

इससे न केवल किसानों का नुकसान होता है बल्कि यह प्रक्रिया कार्बन उत्सर्जन को और बढ़ा देती है। जिनाली ने इसी बेकार समझे जाने वाले हिस्से में संभावनाओं का खज़ाना देखा। उन्होंने रिसर्च शुरू की कि कैसे केले के तनों से फाइबर निकाला जा सकता है और फिर उसे प्राकृतिक बाइंडर और स्टार्च के साथ मिलाकर, एक ऐसा पदार्थ बनाया जा सकता है जो हर लिहाज से चमड़े का विकल्प बन सके।

यह प्रयोग सफल हुआ और जन्म हुआ बनोफी लेदर का—एक ऐसा पदार्थ जो दिखने में, छूने में और यहां तक कि महकने में भी जानवरों के चमड़े जैसा लगता है। लेकिन इसमें किसी जानवर की जान नहीं जाती, न ही नदियों में ज़हरीले रसायन डाले जाते हैं और न ही इसमें पानी और ऊर्जा की बर्बादी होती है। पारंपरिक चमड़े की तुलना में बनोफी लेदर बनाने की प्रक्रिया में 95% कम पानी लगता है, 90% तक कम कार्बन Emission होता है और toxic waste लगभग शून्य हो जाता है। यह केवल एक विकल्प नहीं बल्कि फैशन इंडस्ट्री को बदलने वाली क्रांति है।

जिनाली मोदी ने इस यात्रा को सिर्फ विज्ञान तक सीमित नहीं रखा, उन्होंने इसे समाज से भी जोड़ा। उनकी कंपनी Banofi Biomaterials में आज 60% महिलाएँ काम करती हैं। ये महिलाएँ केवल कर्मचारी नहीं बल्कि बदलाव की साथी हैं। वे करीब 100 छोटे किसानों से जुड़ी हैं, जिनके खेतों में केले उगते हैं। अब तक जिन तनों को किसान बेकार समझकर जला देते थे, अब वही उनके लिए अतिरिक्त आमदनी का साधन बन चुके हैं। यानी यह मॉडल किसानों की जेबें भर रहा है, महिलाओं को रोजगार दे रहा है और पर्यावरण को बचा रहा है।

आज बनोफी लेदर सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि दुनिया के बड़े फैशन हाउसों की नज़र में भी है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई लग्ज़री ब्रांड्स इसे अपनाने में रुचि दिखा रहे हैं। इसका कारण यह है कि अब उपभोक्ता भी बदल चुके हैं। नई पीढ़ी फैशन चाहती है लेकिन अपराधबोध के बिना। वह जानना चाहती है कि जिस बैग या जूते को उन्होंने खरीदा है, उसके पीछे किसी जानवर की हत्या नहीं हुई और न ही धरती को नुकसान पहुंचा। यही कारण है कि बनोफी लेदर जैसे innovation को दुनिया खुले दिल से अपना रही है।

जिनाली मोदी की उपलब्धियाँ यहीं तक सीमित नहीं हैं। 2023 में उन्होंने दुनिया का सबसे बड़ा सामाजिक उद्यमिता पुरस्कार—Hult Prize जीता, जिसकी इनामी राशि 1 मिलियन अमेरिकी डॉलर थी। यही नहीं, उन्हें भारत में “वर्ष का सर्वश्रेष्ठ स्थायी सामग्री” का सम्मान मिला, WEGE पुरस्कार से नवाज़ा गया और World Economic Forum (WEF) ने भी उन्हें वैश्विक स्तर पर मान्यता दी। MIT के Climate and Energy Prize ने भी उनके काम को समर्थन दिया। यह सब केवल पुरस्कार नहीं हैं, बल्कि इस बात का प्रमाण हैं कि दुनिया अब ऐसे विचारों की ओर देख रही है, जो धरती को बचाने के लिए जरूरी हैं।

संयुक्त राष्ट्र का Young Champions of the Earth प्रोग्राम भी इन्हीं विचारों को आगे बढ़ाने के लिए बनाया गया है। यह कार्यक्रम दुनिया के उन युवाओं को सम्मानित करता है, जिनके पास पर्यावरण की रक्षा और बहाली के लिए असाधारण विचार हैं। उन्हें न केवल पहचान दी जाती है बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर बोलने का अवसर भी दिया जाता है। जब 2025 में जिनाली मोदी का नाम इस पुरस्कार की विजेता सूची में आया, तो यह केवल उनकी जीत नहीं थी बल्कि भारत के लिए भी गर्व का क्षण था। यह संदेश था कि भारत की युवा पीढ़ी अब केवल उपभोक्ता नहीं बल्कि innovator भी है।

लेकिन इस सफर की चुनौतियाँ भी कम नहीं थीं। शुरुआत में Investor संशय में थे। वे सोच भी नहीं सकते थे कि केले के तनों से बना पदार्थ वास्तव में चमड़े की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है। फैशन इंडस्ट्री के दिग्गजों को यह समझाना आसान नहीं था कि यह न केवल टिकाऊ है बल्कि किफायती भी साबित हो सकता है। लेकिन जिनाली मोदी ने हार नहीं मानी। उन्होंने अपने उत्पाद के सैंपल बनाए, फैशन शो में प्रस्तुत किए, वैज्ञानिक आँकड़ों के साथ साबित किया कि यह पर्यावरण को कितना बचाता है। धीरे-धीरे ही सही, लेकिन लोगों का विश्वास जीतने में वे सफल रहीं। आज उनकी कंपनी का नाम टिकाऊ फैशन के भविष्य से जोड़ा जाता है।

जिनाली मोदी की कहानी हमें यह भी सिखाती है कि innovation अक्सर वहीं से आता है, जहाँ लोग सबसे कम उम्मीद करते हैं। केले का तना, जिसे अब तक सिर्फ कचरा समझा जाता था, आज एक वैश्विक समाधान बन चुका है। और यह सब संभव हुआ क्योंकि एक युवा महिला ने अपने सपनों को सीमाओं में नहीं बाँधा, बल्कि उन्हें साकार करने की हिम्मत की।

उनकी यह यात्रा आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा है। यह हमें बताती है कि अगर विज्ञान और उद्यमिता को सही दिशा दी जाए, तो वह न केवल मुनाफा कमा सकता है बल्कि समाज और धरती दोनों को बदल सकता है। यही वजह है कि जिनाली मोदी की कहानी किसी डॉक्यूमेंट्री की तरह लगती है—संघर्ष से लेकर सफलता तक, प्रयोग से लेकर क्रांति तक और व्यक्तिगत सपनों से लेकर वैश्विक प्रभाव तक।

आज जब फैशन इंडस्ट्री पर सवाल उठ रहे हैं कि वह धरती को कितना नुकसान पहुँचा रही है, तब जिनाली मोदी जैसे युवा उद्यमी उम्मीद की किरण हैं। वे साबित कर रही हैं कि भविष्य का फैशन वही होगा, जो धरती के साथ तालमेल बिठाएगा। और शायद यही वजह है कि उनकी यात्रा सिर्फ़ एक उद्यमी की कहानी नहीं बल्कि आने वाले कल की परिभाषा है।

Conclusion

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