सोचिए… दुनिया के सबसे संवेदनशील इलाके में, जहां से हर दिन करोड़ों बैरल तेल गुजरता है, वहां अचानक सन्नाटा छा जाए। न धमाका, न मिसाइल, न कोई युद्ध की आधिकारिक घोषणा। बस एक सुबह तेल के कुओं पर काम करने वाले मजदूर काम पर न आएं। मशीनें बंद रहें। पाइपलाइन सूखी रह जाए। और कुछ ही घंटों में दुनिया के शेयर बाजार कांपने लगें, पेट्रोल पंपों पर अफरा-तफरी मच जाए, और सरकारें इमरजेंसी मीटिंग बुलाने पर मजबूर हो जाएं। डर यहीं से पैदा होता है—अगर Iran के तेल कुओं पर सच में ऐसा हुआ, तो क्या पूरी दुनिया संभल पाएगी? और जिज्ञासा ये कि क्या यह खतरा बमों और मिसाइलों से भी ज्यादा खतरनाक है?
जब भी कच्चे तेल की कीमतों या global supply की बात होती है, तो सबकी निगाहें अपने आप Iran और Strait of Hormuz पर टिक जाती हैं। आमतौर पर चर्चा यहीं तक सीमित रहती है कि अगर अमेरिका या इजरायल ने ईरान पर हमला किया, या Iran ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बंद कर दिया, तो तेल का संकट आ जाएगा। लेकिन असली खतरा शायद कहीं और छुपा है। एक ऐसा खतरा, जो न रडार पर दिखता है, न सैटेलाइट इमेज में। यह खतरा है—Iran के भीतर, उसके तेल उद्योग में काम करने वाले लोगों का गुस्सा।
आज Iran के तेल कुओं पर बाहर से देखने पर शांति है। लेकिन यह शांति वैसी ही है जैसे किसी ज्वालामुखी के मुंह पर जमी ठंडी राख। अंदर क्या उबल रहा है, इसका अंदाजा बहुत कम लोगों को है। हाल के महीनों में Iran के अंदरूनी हालात जिस तरह बिगड़े हैं, उसने इस डर को और गहरा कर दिया है कि अगर मजदूरों ने काम रोक दिया, तो यह सिर्फ ईरान का संकट नहीं रहेगा। यह एक global oil shock बन जाएगा।
हाल ही में Iran में हुए विरोध प्रदर्शनों को सरकार ने जिस बेरहमी से कुचला, उसने पूरी दुनिया को चौंका दिया। रिपोर्ट्स के मुताबिक, मरने वालों की संख्या हजारों में हो सकती है। यह दमन इतना भयानक था कि उसने Iran के 47 साल के इतिहास में 1988, 1999 और 2022 की कुख्यात घटनाओं को भी पीछे छोड़ दिया। तेहरान और बड़े शहरों पर सरकार ने नियंत्रण तो वापस पा लिया है, लेकिन सवाल ये है कि क्या लोगों के दिलों और पेटों पर भी कंट्रोल वापस पा लिया गया है?
अमेरिका के राष्ट्रपति Donald Trump, जिन्होंने शुरुआत में प्रदर्शनकारियों के समर्थन जैसे बयान दिए थे, अब मानते हैं कि हालात काबू में हैं। उन्होंने कहा कि “Iran में हत्याएं रुक गई हैं।” जब उनसे सैन्य कार्रवाई के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने बात को टालते हुए कहा कि अमेरिका स्थिति पर नजर बनाए हुए है। लेकिन यह बयान एक बड़ी हकीकत को छुपाता है। गोलियों से लोग चुप हो सकते हैं, लेकिन महंगाई, बेरोजगारी और आर्थिक टूटन को गोलियों से खत्म नहीं किया जा सकता।
आज Iran में महंगाई दर करीब 50% के आसपास पहुंच चुकी है। वहां की मुद्रा ‘रियाल’ लगातार गिरती जा रही है। आम लोगों की बचत पिघल रही है। बेरोजगारी चरम पर है। युवा भविष्य से डरे हुए हैं और बुजुर्ग वर्तमान से टूट चुके हैं। यही वो हालात हैं, जिनमें इतिहास बताता है कि सबसे पहले हिलने वाला सेक्टर होता है—तेल।
Iran की अर्थव्यवस्था का दिल तेल है। और इस दिल पर पकड़ है एक बेहद ताकतवर और विवादास्पद संगठन की—Islamic Revolutionary Guard Corps। IRGC सिर्फ एक सैन्य संगठन नहीं है। यह Iran का सबसे बड़ा कारोबारी नेटवर्क भी है। तेल, गैस, कंस्ट्रक्शन, टेलीकॉम, बंदरगाह—लगभग हर बड़े सेक्टर में इसकी सीधी या परोक्ष मौजूदगी है। देश के सर्वोच्च नेता Ali Khamenei के संरक्षण में यह एक ऐसा सिस्टम बन चुका है, जहां बिना राजनीतिक बदलाव के आर्थिक सुधार लगभग नामुमकिन हैं।
इसी वजह से कई विश्लेषक मानते हैं कि Iran अब एक नए दौर में प्रवेश कर सकता है—सविनय अवज्ञा यानी Civil Disobedience। इसका मतलब है, बिना हथियार उठाए, बिना हिंसा के, सिस्टम को काम न करने देना। और अगर यह सविनय अवज्ञा तेल क्षेत्रों तक पहुंच गई, तो असर सीधा वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा।
यह डर कोई काल्पनिक नहीं है। इतिहास खुद इसकी गवाही देता है। साल 1978। उस समय भी Iran में विरोध प्रदर्शन चल रहे थे। शुरुआत में शाह की सरकार को लगा कि वह हालात संभाल लेगी। लेकिन फिर तेल कर्मचारियों ने काम बंद कर दिया। कुछ ही हफ्तों में Iran का तेल उत्पादन करीब 80% तक गिर गया। यह सिर्फ आर्थिक झटका नहीं था, यह सत्ता की रीढ़ पर सीधा वार था। यही वह क्षण था, जिसने ईरानी क्रांति की नींव रखी और अयातुल्ला खुमैनी को सत्ता में ले आया। आज तक के इतिहास में इसे सबसे बड़ा ‘ऑयल आउटेज’ माना जाता है।
यही इतिहास आज भी Iran की सत्ता को डराता है। शायद इसी डर को आवाज देते हुए, ईरान के पूर्व शाह के बेटे Reza Pahlavi ने सोशल मीडिया पर एक अपील की। उन्होंने तेल, गैस और ऊर्जा क्षेत्र के कर्मचारियों से देशव्यापी हड़ताल शुरू करने का आह्वान किया। उनका साफ संदेश था—अगर शासन को चुनौती देनी है, तो उसकी आर्थिक नब्ज काटनी होगी।
हालांकि, 1978 और आज के Iran में कई फर्क भी हैं। आज Iran का तेल उद्योग पहले से कहीं ज्यादा सैन्यीकृत है। IRGC का सीधा नियंत्रण है न सिर्फ बुनियादी ढांचे पर, बल्कि वहां काम करने वाले लोगों पर भी। कई कर्मचारी उनके अपने वफादार माने जाते हैं। इसके अलावा, खुज़ेस्तान और कोहगिलुयेह जैसे बड़े तेल क्षेत्रों पर सुरक्षा बलों की कड़ी निगरानी है। वहां हड़ताल कर पाना आसान नहीं है।
एक और बड़ा फर्क है—आज ज्यादातर कर्मचारी कॉन्ट्रैक्ट पर काम करते हैं। उनके पास नौकरी की कोई गारंटी नहीं है। वेतन पहले ही महंगाई से कुचला हुआ है। ऐसे में उनके लिए हड़ताल का मतलब सिर्फ विरोध नहीं, बल्कि अपने परिवार की रोजी-रोटी को सीधे खतरे में डालना है। यही वजह है कि फिलहाल बड़े पैमाने पर हड़ताल की संभावना कम नजर आती है।
लेकिन खतरा पूरी तरह टला नहीं है। क्योंकि जब आर्थिक हालात लगातार बिगड़ते हैं, तो एक चिंगारी काफी होती है। आज Iran प्रतिदिन करीब 50 लाख बैरल कच्चा तेल और अन्य पेट्रोलियम तरल पदार्थ पैदा करता है। यह आंकड़ा लगभग 1978 के स्तर के बराबर है। फर्क बस इतना है कि आज दुनिया की तेल पर निर्भरता कहीं ज्यादा है। सप्लाई चेन ज्यादा नाजुक है। और विकल्प कम हैं।
सबसे खतरनाक बात यह है कि यह ऐसा खतरा है, जिस पर White House का कोई सीधा कंट्रोल नहीं है। अमेरिका सैन्य हमलों को रोक सकता है। उसने इजरायल और ईरान को एक-दूसरे के Power plants पर हमला न करने की सलाह देकर यह दिखाया भी है। लेकिन अमेरिका Iran की सड़कों पर उतरने वाले प्रदर्शनकारियों को नहीं रोक सकता। वह तेल के कुओं पर काम करने वाले मजदूरों को आदेश नहीं दे सकता।
जानकारों का मानना है कि ईरान को इस वक्त मिसाइल डिफेंस से ज्यादा ध्यान अपने मजदूरों पर देना चाहिए। क्योंकि बमों से तेल के कुएं कुछ समय के लिए बंद हो सकते हैं, लेकिन अगर मजदूरों ने काम छोड़ दिया, तो उस नुकसान की भरपाई महीनों में भी नहीं हो पाएगी। और इसका असर सिर्फ Iran पर नहीं पड़ेगा।
अगर Iran का तेल उत्पादन अचानक गिरता है, तो सबसे पहले कच्चे तेल की कीमतें आसमान छुएंगी। एशिया, यूरोप और अफ्रीका—हर जगह महंगाई का नया दौर शुरू हो सकता है। भारत जैसे देशों के लिए, जो तेल import पर निर्भर हैं, यह सीधा झटका होगा। ट्रांसपोर्ट महंगा होगा, खाना महंगा होगा, और सरकारों पर सब्सिडी का दबाव बढ़ेगा। यही वजह है कि दुनिया की बड़ी ताकतें भले ही खुले तौर पर युद्ध की बात न करें, लेकिन अंदरखाने Iran के भीतर की स्थिति पर नजर रखे हुए हैं। क्योंकि असली ब्लैक स्वान इवेंट शायद आसमान से नहीं, जमीन से उठे।
आज Iran के तेल कुओं पर जो सन्नाटा है, वह राहत नहीं है। वह चेतावनी है। इतिहास बता चुका है कि जब भी तेल मजदूरों ने आवाज उठाई है, सत्ता हिल गई है। सवाल सिर्फ इतना है—क्या इस बार भी इतिहास खुद को दोहराएगा? और अगर ऐसा हुआ, तो क्या दुनिया उसके लिए तैयार है? यही डर आज वैश्विक अर्थव्यवस्था के दिल में धड़क रहा है।
Conclusion
दुनिया के तेल बाज़ार शांत दिख रहे हैं, लेकिन कहीं एक अदृश्य चिंगारी सुलग रही है। डर ये कि अगर वो भड़की, तो पेट्रोल से लेकर महंगाई तक सब कुछ बेकाबू हो जाएगा। और जिज्ञासा ये कि बिना जंग, बिना मिसाइल—पूरी दुनिया में हाहाकार कैसे मच सकता है? असल खतरा ईरान पर हमले का नहीं, बल्कि तेल कर्मचारियों की संभावित हड़ताल का है।
ईरान भीषण महंगाई, बेरोज़गारी और दमन से जूझ रहा है। इतिहास गवाह है—1978 में तेल मजदूरों की हड़ताल ने उत्पादन 80% गिरा दिया था और क्रांति की नींव रखी थी। आज ईरान रोज़ करीब 50 लाख बैरल तेल पैदा करता है। अगर सप्लाई रुकी, तो वैश्विक बाजार हिल जाएगा। यह खतरा ऐसा है जिसे अमेरिका भी कंट्रोल नहीं कर सकता। बम नहीं, बल्कि मजदूरों के हाथों में दुनिया की तेल सप्लाई की चाबी है।
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