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Inspiring: India-Russia Oil Deal ट्रंप की धमकी भी नहीं रोक पाई सस्ते तेल की भारत को ताक़तवर बनाने वाली डील! 2025

India-Russia

अगर आपको कोई एक ऐसा सौदा मिल जाए, जिसमें पैसा भी बचे, ज़रूरत भी पूरी हो, और आपका सिस्टम भी मजबूत हो जाए—तो क्या आप उसे सिर्फ इसलिए छोड़ देंगे क्योंकि कोई बाहरी ताक़त आपको ऐसा करने से मना कर रही है? कल्पना कीजिए एक ऐसा देश, जो दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्ति से आंख मिलाकर कहता है—”हम जो कर रहे हैं, वो हमारे देश के फायद़े के लिए है, तुम्हारे इशारे पर नहीं।” और यह कोई काल्पनिक कहानी नहीं, बल्कि आज की सबसे बड़ी ऊर्जा रणनीति की हकीकत है—India-Russia के बीच का सस्ता तेल समझौता, जो अमेरिका की आंख की किरकिरी बन चुका है। आज हम इसी विषय पर गहराई में चर्चा करेंगे।

आपको बता दें कि बीते तीन साल में भारत ने जो किया है, वह न सिर्फ आर्थिक दृष्टि से बल्कि कूटनीति के स्तर पर भी बेहद साहसिक रहा है। रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद जब अमेरिका और यूरोपीय संघ जैसे देश रूस से तेल खरीदने से पीछे हट गए, तब भारत ने वही किया जो कोई भी चतुर व्यापारी करता—उसने मौके को पहचाना और रूस की ओर हाथ बढ़ा दिया। और तब से लेकर अब तक भारत हर दिन औसतन 17 से 21 लाख बैरल कच्चा तेल रूस से मंगवा रहा है।

ये आंकड़े यूं ही नहीं बनते। फरवरी 2022 से पहले भारत केवल 0.2 फीसदी तेल ही रूस से मंगवाता था। लेकिन जब रूस पर प्रतिबंध लगे और उसके पास खरीदार कम हो गए, तब भारत ने गेम बदल दिया। 2023 तक यह आंकड़ा 45 फीसदी तक जा पहुंचा। मई 2023 में तो रिकॉर्ड बना—हर दिन 20 लाख बैरल से ज्यादा तेल रूस से भारत आया। भारत इस समय चीन के बाद रूस का सबसे बड़ा एनर्जी पार्टनर बन चुका है।

लेकिन इस साझेदारी से सबसे ज़्यादा नाराज कौन है? अमेरिका। और खासतौर पर डोनाल्ड ट्रंप। राष्ट्रपति बनने के बाद ट्रंप ने भारत पर लगातार दबाव बनाया कि वह रूस से तेल खरीदना बंद करे। उन्होंने खुलेआम चेतावनी दी—अगर भारत यूक्रेन युद्ध खत्म होने से पहले रूस से तेल खरीदता रहा, तो 100 फीसदी टैक्स तक लगाया जा सकता है। और ट्रंप ने सिर्फ धमकी नहीं दी, कार्रवाई भी कर डाली—1 अगस्त से भारत के अमेरिकी Export पर 25 फीसदी टैक्स लगा दिया गया।

लेकिन भारत झुका नहीं। क्योंकि भारत जानता है कि तेल सिर्फ एक ऊर्जा स्रोत नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता का इंजन है। भारत ने ये समझ लिया है कि अगर उसे अपनी अर्थव्यवस्था को वैश्विक संकटों से बचाना है, तो उसे अमेरिका या किसी और देश की मर्जी पर नहीं, बल्कि अपने फ़ायदे पर निर्णय लेना होगा। और रूस से मिलने वाला सस्ता तेल भारत के लिए अब सिर्फ एक विकल्प नहीं, बल्कि एक रणनीति बन चुका है।

इस रणनीति की सबसे दिलचस्प बात ये है कि इसमें निजी कंपनियों ने सबसे आगे रहकर भूमिका निभाई। दिसंबर 2024 में रिलायंस इंडस्ट्रीज ने रूस के साथ एक ऐतिहासिक समझौता किया—अगले 10 साल तक हर दिन 5 लाख बैरल तेल रूस से मिलेगा। इस डील की कीमत है—13 अरब डॉलर सालाना। एक तरफ दुनिया रूस से दूरी बना रही थी, दूसरी तरफ रिलायंस ने उससे हाथ मिला लिया।

नयारा एनर्जी, जो पहले से ही रूस की कंपनी रोसनेफ्ट के साथ जुड़ी हुई है, उसने भी तेल की खरीद जारी रखी। 2025 के पहले छह महीनों में रूस से भारत में जितना तेल आया, उसमें से करीब 50 फीसदी हिस्सा सिर्फ रिलायंस और नयारा ने खरीदा। सरकारी कंपनियां जैसे IOC, BPCL और HPCL आमतौर पर तात्कालिक जरूरतों पर आधारित खरीद करती हैं, लेकिन प्राइवेट कंपनियों ने लॉन्ग टर्म सोच के साथ डील्स की।

अब सवाल उठता है कि आखिर अमेरिका को इससे इतनी परेशानी क्यों है? क्या उसे वाकई भारत की ऊर्जा सुरक्षा की चिंता है? नहीं। असल परेशानी डॉलर से है। दरअसल, भारत और रूस अब तेल का भुगतान डॉलर में नहीं, बल्कि रुपये और रूबल में कर रहे हैं। यानी डॉलर को बायपास किया जा रहा है। अमेरिका के लिए यह एक बड़ा झटका है क्योंकि अब तक पूरी दुनिया में तेल का लेन-देन डॉलर के ज़रिए होता रहा है। भारत-रूस डील से डॉलर की ‘तेल पर पकड़’ कमजोर होती दिख रही है।

और यही वह बिंदु है, जिसने ट्रंप को सबसे ज्यादा परेशान कर रखा है। उन्हें डर है कि अगर भारत और रूस जैसे देश मिलकर डॉलर को दरकिनार करने लगे, तो आने वाले समय में अन्य देश भी यही रास्ता अपनाएंगे। इससे अमेरिका की वित्तीय ताक़त को गहरा झटका लग सकता है। यही कारण है कि ट्रंप बार-बार भारत पर दबाव बना रहे हैं।

लेकिन भारत ने बड़ी चतुराई से इसका जवाब दिया। ऊर्जा मंत्री हरदीप पुरी ने साफ शब्दों में कहा—भारत किसी एक देश पर निर्भर नहीं रहना चाहता। यही वजह है कि भारत अब 40 से ज्यादा देशों से तेल खरीदने की कोशिश कर रहा है—चाहे वो अमेरिका हो, गयाना हो, ब्राज़ील हो या अफ्रीका के देश। लेकिन साथ ही भारत ने यह भी नहीं छोड़ा कि जो सस्ता और भरोसेमंद है, उसे नज़रअंदाज़ किया जाए। और फिलहाल, रूस वही है।

जनवरी 2025 से जून 2025 के बीच रूस से भारत का तेल Import हर महीने 35 से 43 फीसदी के बीच रहा। जून में यह आंकड़ा 20.8 लाख बैरल प्रतिदिन तक पहुंच गया—जो साल का सबसे ऊंचा स्तर था। जुलाई में जरूर थोड़ी गिरावट आई, लेकिन रिलायंस और नयारा जैसी कंपनियों ने अपनी डील्स जारी रखीं। अमेरिका से भारत का तेल Import भी 51 फीसदी बढ़ा, जो अब 2.7 लाख बैरल प्रतिदिन तक पहुंच गया है। फिर भी, रूस सबसे बड़ा सप्लायर बना हुआ है।

अब सोचिए—एक तरफ अमेरिका की धमकियां, दूसरी तरफ भारत का फोकस्ड व्यापारिक रवैया। और इस बीच सस्ते तेल की वजह से भारत ने 2023 और 2024 में 1 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा की बचत की। ये कोई छोटी बात नहीं है। यह बचत भारत के इन्फ्रास्ट्रक्चर, शिक्षा, स्वास्थ्य और रक्षा जैसी तमाम योजनाओं में लगाई जा सकती है।

भारत का यह फैसला कि वह रूस से तेल खरीदेगा, दरअसल सिर्फ़ आर्थिक नहीं, बल्कि एक भौगोलिक और रणनीतिक निर्णय भी है। दुनिया में जब दो महाशक्तियों के बीच खींचतान चल रही हो—अमेरिका और रूस—तब भारत ने अपनी ‘तटस्थता’ को अवसर में बदला है। न वह पूरी तरह अमेरिका के पाले में गया, और न ही रूस के। बल्कि भारत ने यह दिखाया कि वह अपने निर्णय खुद ले सकता है।

अब सवाल ये है कि आगे क्या होगा? क्या ट्रंप वाकई भारत पर 100% टैक्स लगाएंगे? या फिर दुनिया की आर्थिक सच्चाई उन्हें झुकने पर मजबूर कर देगी? क्योंकि भारत जैसे देश को रोकना अब आसान नहीं है। एक ऐसा देश, जो 140 करोड़ लोगों की ऊर्जा जरूरतों को लेकर गंभीर है, वो अमेरिका की धमकियों से नहीं, अपने डेटा और हितों से फैसला करेगा।

क्रूड ऑयल, जो कभी सिर्फ़ एक ज्वलनशील पदार्थ था, अब ग्लोबल राजनीति का सबसे बड़ा कार्ड बन चुका है। और इस कार्ड को खेलने में भारत ने न सिर्फ चालाकी दिखाई है, बल्कि साहस भी दिखाया है। रूस से डील करना आज फायदे का सौदा है, और भारत इस मौके को हाथ से जाने नहीं देना चाहता।

रूस से जुड़ा ये सस्ता तेल भारत के इंजन में सिर्फ़ ईंधन नहीं भर रहा, ये भारत की कूटनीतिक आत्मनिर्भरता को भी मजबूत कर रहा है। और शायद यही वो ‘बड़ा खेल’ है, जिसे अमेरिका समझ रहा है—but control नहीं कर पा रहा।

Conclusion

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