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India Russia oil deal 2025: Energy डिप्लोमेसी में भारत की जीत! रूस के साथ तेल डील से अमेरिका-यूरोप की चिंता बढ़ी।

Energy

एक तरफ आग की लपटों में घिरा यूक्रेन, दूसरी तरफ global platform पर रूस को अलग-थलग करने की साजिशें, और बीच में फंसा भारत — जिसकी Energy की प्यास हर दिन बढ़ती जा रही है। लेकिन अब सवाल सिर्फ पेट्रोल या डीजल का नहीं है… सवाल है भारत की संप्रभुता का, उसकी रणनीतिक समझ का, और सबसे अहम—क्या भारत अमेरिका और यूरोप की धमकियों के आगे झुक जाएगा या फिर अपने हितों की रक्षा करते हुए ‘अग्निपरीक्षा’ में सफल होगा? दुनिया की दो सबसे ताक़तवर ताक़तें—अमेरिका और यूरोप—भारत पर तलवार लटकाए खड़ी हैं, और यह कोई मामूली चेतावनी नहीं, बल्कि आर्थिक युद्ध की एक आहट है…आज हम इसी विषय पर गहराई में चर्चा करेंगे।

भारत ने रूस से सस्ता कच्चा तेल खरीदकर दुनिया को चौंका दिया था। जब अमेरिका और यूरोप ने रूस पर सैंक्शंस लगाकर उससे मुंह मोड़ लिया, तब भारत ने अपने राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि मानते हुए Energy security के लिए वह रास्ता चुना जो पश्चिमी देशों को बिल्कुल नहीं भाया। अब वही देश भारत पर दबाव बना रहे हैं कि वह अपनी ऑयल स्ट्रैटेजी बदले। लेकिन क्या भारत झुकेगा? या फिर पहले की तरह अपनी ज़मीन पर खड़ा रहेगा?

NATO महासचिव मार्क रुटे और अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सीधा संदेश दिया है—अगर भारत, चीन और ब्राजील रूस से तेल खरीदना जारी रखते हैं, तो उन पर सेकेंडरी सैंक्शंस लगाए जाएंगे। ये सैंक्शंस सिर्फ शब्द नहीं हैं, ये वो आर्थिक हथियार हैं जो भारत के एक्सपोर्ट, फाइनेंशियल सिस्टम और इंडस्ट्री को बुरी तरह प्रभावित कर सकते हैं। बात यहां तक पहुंच चुकी है कि ट्रंप सरकार 100% तक टैरिफ लगाने की चेतावनी दे चुकी है। और कुछ हफ्ते पहले तो अमेरिकी संसद में एक ऐसा बिल आया जिसमें रूस से व्यापार करने वालों पर 500% तक का टैरिफ लगाने की बात कही गई।

लेकिन भारत ने अभी तक अपनी पॉलिसी में कोई बदलाव नहीं किया है। भारत का रुख साफ है—जब तक किसी उत्पाद पर सीधा अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध नहीं है, तब तक भारत सबसे अच्छी डील खोजेगा, चाहे वह रूस से क्यों न हो। और रूस वो देश है जिसने भारत को कच्चा तेल रियायती दरों पर देना शुरू किया, जब दुनिया में कीमतें आसमान छू रही थीं। भारत की रिफाइनिंग कंपनियों ने इस मौके को तुरंत समझा और रूसी तेल को हथिया लिया।

आज यही रणनीति भारत की आर्थिक स्थिरता की रीढ़ बन चुकी है। ग्लोबल थिंक टैंक GTRI यानी ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव के मुताबिक, रूस से सस्ते तेल ने भारत को न सिर्फ महंगाई से बचाया बल्कि पूरे देश की मैक्रोइकोनॉमिक स्थिरता को बनाए रखा। और अगर भारत अब दबाव में आकर इस नीति से पीछे हटता है, तो यह न सिर्फ आर्थिक रूप से नुकसानदेह होगा बल्कि एक कमजोर संदेश भी देगा—कि भारत बाहरी दबाव में आकर अपनी नीति बदलता है।

इस बीच रूस से भारत का तेल Import लगातार नई ऊंचाइयों पर पहुंच रहा है। जून महीने में भारत ने रूस से 2 मिलियन बैरल प्रतिदिन कच्चा तेल Import किया—जो जुलाई 2024 के बाद का सबसे ऊंचा आंकड़ा है। मतलब साफ है—पश्चिमी देशों के तमाम दबावों और चेतावनियों के बावजूद भारत की Energy Policy में कोई बदलाव नहीं आया है। रूस अब भारत का सबसे बड़ा तेल सप्लायर बन चुका है—इराक, सऊदी अरब और UAE जैसे पारंपरिक suppliers को पीछे छोड़ते हुए।

आप सोच सकते हैं कि ये सिर्फ आंकड़े हैं… लेकिन दरअसल यह भारत की रणनीतिक स्वतंत्रता का सबूत है। एक दौर था जब रूस से भारत के तेल Import की हिस्सेदारी 2% से भी कम थी, और आज वही आंकड़ा 35 से 36% के आसपास है। 2024 में भारत ने रूस से 50 अरब डॉलर से अधिक का तेल खरीदा—जो उसके कुल तेल Import का एक-तिहाई हिस्सा है। ये कोई सामान्य व्यापार नहीं है… यह एक मजबूत रणनीतिक भागीदारी है जो केवल Energy तक सीमित नहीं है, बल्कि भू-राजनीतिक संतुलन को भी दर्शाता है।

भारत की इस रणनीति के पीछे सिर्फ सस्ता तेल नहीं है, बल्कि वह लचीलापन भी है जो रूस दे रहा है। जब पश्चिमी देश रूसी तेल पर 60 डॉलर प्रति बैरल की सीमा लगा रहे हैं, और इंश्योरेंस व शिपिंग पर रोक लगा रहे हैं, तब रूस ने भारत को विकल्प दिए—वैकल्पिक भुगतान प्रणाली, नई शिपिंग व्यवस्थाएं और स्वतंत्र इंश्योरेंस फ्रेमवर्क। और भारत ने इन सबका लाभ उठाया है।

लेकिन अब अमेरिका चाहता है कि भारत ये सब छोड़ दे। वह चाहता है कि भारत सिर्फ उन्हीं शर्तों पर खेले जो वॉशिंगटन तय करता है। सवाल यह है—क्या अमेरिका भारत को यह गारंटी देगा कि अगर उसने रूस से तेल खरीदना बंद कर दिया, तो वह भारत की Energy जरूरतों की भरपाई करेगा? क्या अमेरिका सस्ते रेट पर तेल देगा? और क्या वह भारत को यह भरोसा देगा कि भविष्य में टैरिफ या सैंक्शन से उसे बचाया जाएगा?

GTRI के संस्थापक अजय श्रीवास्तव इस बात को लेकर साफ हैं—अगर भारत आज झुकता है, तो कल अमेरिका और नई मांगें लेकर आएगा। और यह सिलसिला कभी नहीं रुकेगा। इसलिए भारत को अपनी नीति में किसी तरह की कमजोरी नहीं दिखानी चाहिए। वरना यह न केवल रूस से रिश्तों को कमजोर करेगा बल्कि भारत की global image पर भी असर डालेगा।

भारत सरकार इस वक्त बहुत नाजुक स्थिति में है। एक तरफ वह अमेरिका और यूरोपीय देशों को शांत रखना चाहती है, ताकि व्यापार, टेक्नोलॉजी और निवेश जैसे मुद्दों पर आगे बढ़ा जा सके। दूसरी तरफ रूस से वह संबंध नहीं बिगाड़ना चाहती क्योंकि वह भारत का न केवल बड़ा तेल supplier है, बल्कि एक पुराना रणनीतिक सहयोगी भी है। ऐसे में सरकार लगातार वॉशिंगटन से बातचीत कर रही है, ताकि भारत के Energy security के तर्क को समझाया जा सके।

भारत की ज़रूरतें बहुत व्यावहारिक हैं—भारत अपनी ज़रूरत का 88% कच्चा तेल Import करता है। और इतनी भारी निर्भरता में कोई भी एक झटका पूरी अर्थव्यवस्था को हिला सकता है। इसीलिए भारत को ऐसे किसी दबाव में नहीं आना चाहिए जो उसकी कीमतों को अस्थिर कर दे या घरेलू महंगाई को बढ़ा दे। और यही वजह है कि भारत अभी भी रूस के साथ अपना व्यापार बनाए हुए है।

अब देखना यह है कि आने वाले हफ्तों में अमेरिका अपने धमकी भरे रुख पर कितना अड़ा रहता है। अगर ट्रंप प्रशासन वाकई 100% सेकेंडरी टैरिफ लागू करता है, तो यह भारत के कई सेक्टरों के लिए एक तगड़ा झटका हो सकता है। लेकिन इसका दूसरा पहलू यह भी है—क्या भारत इतनी आसानी से दबाव में आ जाएगा? अब तक के संकेत तो यही कहते हैं—नहीं।

भारत ने इतिहास में हमेशा दिखाया है कि वह तब तक झुकता नहीं जब तक उसके आत्म-हित पर सीधा हमला न हो। चाहे वो रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच का तेल व्यापार हो, या फिर अमेरिका के Export दबाव। भारत ने अपने नागरिकों, अपने उद्योगों और अपनी महंगाई को ध्यान में रखकर ही हर नीति बनाई है। और इस बार भी जब पूरी दुनिया उसे एक ओर खींचना चाहती है, भारत बीच में खड़ा है—संभलकर, सोचकर और समझदारी के साथ।

भारत की यह ‘अग्निपरीक्षा’ अभी खत्म नहीं हुई है। लेकिन अगर भारत इस इम्तिहान में अपने हितों को बचा पाया, तो यह सिर्फ एक कूटनीतिक जीत नहीं होगी—यह पूरी दुनिया को यह संदेश देगी कि भारत अब किसी भी वैश्विक शक्ति के सामने झुकने वाला देश नहीं, बल्कि अपने फैसले खुद लेने वाला आत्मनिर्भर राष्ट्र है।

Conclusion

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