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FTA से खुलेंगे भारत के नए दरवाज़े! भारत–ओमान FTA क्यों बन सकता है ट्रेड, जॉब्स और निवेश का गेम-चेंजर? 2025

FTA

सोचिए ज़रा… एक ऐसी दुनिया, जहां सुबह उठते ही खबर आती है कि कहीं टैरिफ बढ़ गए हैं, कहीं Import पर रोक लग गई है, कहीं व्यापार युद्ध की आहट है। ग्लोबल इकॉनमी में डर, अनिश्चितता और प्रेशर का माहौल है। ऐसे वक्त में अचानक भारत और ओमान के बीच एक खबर आती है—FTA पर साइन।

पहली नज़र में यह एक साधारण सी डिप्लोमैटिक हेडलाइन लग सकती है, लेकिन अगर आप थोड़ा गहराई से सोचें, तो यहीं से एक बड़ी कहानी शुरू होती है। एक ऐसी कहानी, जो सिर्फ दो देशों के बीच व्यापार तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत की ग्लोबल रणनीति, मिडिल ईस्ट में उसकी पकड़ और आने वाले सालों की आर्थिक दिशा को भी इशारा करती है।

आपको बता दें कि आज दुनिया जिस दौर से गुजर रही है, वहां “फ्री ट्रेड” शब्द अपने आप में बड़ा सवाल बन चुका है। अमेरिका से लेकर यूरोप तक, टैरिफ बढ़ाने की बातें हो रही हैं। प्रोटेक्शनिज़्म फिर से लौटता दिख रहा है। ऐसे माहौल में भारत और ओमान का फ्री ट्रेड एग्रीमेंट सिर्फ एक डील नहीं, बल्कि एक मैसेज है—कि भारत अभी भी खुले व्यापार, कनेक्टिविटी और लॉन्ग-टर्म ग्रोथ में विश्वास करता है। लेकिन सवाल यह है कि आखिर ये FTA होता क्या है? कैसे काम करता है? और भारत–ओमान की यह डील इतनी अहम क्यों मानी जा रही है?

फ्री ट्रेड एग्रीमेंट यानी FTA, नाम से ही थोड़ा-बहुत अंदाजा हो जाता है। यह दो या दो से ज्यादा देशों के बीच एक समझौता होता है, जिसमें यह तय किया जाता है कि आपस में व्यापार को आसान बनाया जाएगा। आसान का मतलब सिर्फ इतना नहीं कि टैक्स हटा दिया जाए, बल्कि इसका मतलब है व्यापार में आने वाली हर तरह की रुकावट को कम करना। जब दो देश FTA साइन करते हैं, तो वे यह कहते हैं कि हम एक-दूसरे के सामान और सेवाओं पर लगने वाले टैरिफ, ड्यूटी और कई बार गैर-ज़रूरी नियमों को कम करेंगे या खत्म करेंगे, ताकि व्यापार तेज़ हो सके।

यहां एक बात समझना बहुत ज़रूरी है। फ्री ट्रेड एग्रीमेंट का मतलब यह नहीं होता कि हर चीज़ पर ज़ीरो टैक्स लग जाएगा। दुनिया में शायद ही कोई ऐसा FTA हो, जहां हर प्रोडक्ट पूरी तरह टैक्स-फ्री हो। असल में FTA एक बैलेंसिंग एक्ट होता है। देश यह देखते हैं कि कौन-से सेक्टर में वे मजबूत हैं और कौन-से सेक्टर संवेदनशील हैं। मजबूत सेक्टर को एक्सपोर्ट का मौका दिया जाता है और संवेदनशील सेक्टर को प्रोटेक्शन में रखा जाता है।

अब अगर भारत और ओमान के FTA की बात करें, तो यह डील इसी संतुलन का एक अच्छा उदाहरण है। इस समझौते के तहत ओमान में भारत के करीब 98 प्रतिशत एक्सपोर्ट्स को ड्यूटी-फ्री एक्सेस मिलेगा। यानी टेक्सटाइल, एग्रीकल्चर प्रोडक्ट्स, लेदर गुड्स, जेम्स एंड ज्वेलरी, इंजीनियरिंग गुड्स—ये सभी अब ओमान के मार्केट में बिना या बहुत कम टैक्स के पहुंच पाएंगे। इसका सीधा मतलब यह है कि भारतीय सामान ओमान में सस्ता होगा, ज्यादा प्रतिस्पर्धी होगा और वहां के बाजार में ज्यादा आसानी से बिक पाएगा।

दूसरी तरफ भारत भी ओमान से आने वाले कुछ प्रोडक्ट्स पर टैरिफ कम करेगा। जैसे खजूर, मार्बल और कुछ पेट्रोकेमिकल आइटम्स। ओमान की इकॉनमी में इन प्रोडक्ट्स का खास रोल है। लेकिन भारत ने यहां भी सावधानी बरती है। जिन सेक्टर्स को भारत संवेदनशील मानता है—जैसे डेयरी प्रोडक्ट्स, चाय, कॉफी, रबर, तंबाकू, सोना-चांदी, जूते और कुछ श्रम-प्रधान उद्योग—उन्हें इस डील में अलग रखा गया है। यानी उन पर कोई बड़ी रियायत नहीं दी गई है।

यही FTA की असली समझदारी होती है। हर देश अपनी अर्थव्यवस्था की नसें पहचानता है। भारत जानता है कि कृषि और कुछ श्रम-प्रधान सेक्टर्स में बहुत बड़े पैमाने पर रोज़गार जुड़ा हुआ है। अगर इन सेक्टर्स को अचानक खोल दिया जाए, तो घरेलू इंडस्ट्री को नुकसान हो सकता है। इसलिए FTA में यह तय किया गया कि इन क्षेत्रों को सुरक्षा दी जाएगी।

अब सवाल उठता है कि FTA सिर्फ टैक्स कम करने तक ही सीमित है या इससे कुछ और भी होता है? जवाब है—बहुत कुछ और। असल में आधुनिक FTA सिर्फ सामानों तक सीमित नहीं होते। इनमें सेवाएं, Investment, प्रोफेशनल्स की आवाजाही, स्टैंडर्ड्स, सर्टिफिकेशन और यहां तक कि सोशल सिक्योरिटी जैसे मुद्दे भी शामिल होते हैं।

भारत–ओमान FTA में सेवाओं को खास महत्व दिया गया है। ओमान का Total service imports अरबों डॉलर का है, लेकिन इसमें भारत की हिस्सेदारी अभी बहुत कम है। इसका मतलब यह है कि यहां भारतीय कंपनियों और प्रोफेशनल्स के लिए बहुत बड़ा अवसर मौजूद है। आईटी सर्विसेज, प्रोफेशनल कंसल्टिंग, एजुकेशन, हेल्थकेयर, रिसर्च और डेवलपमेंट—ये सभी ऐसे क्षेत्र हैं जहां भारतीय कंपनियां पहले से मजबूत हैं। इस डील के बाद इन सेक्टर्स में भारत की मौजूदगी बढ़ सकती है।

इस समझौते का एक और अहम पहलू है भारतीय प्रोफेशनल्स और वर्कर्स की आवाजाही। मिडिल ईस्ट हमेशा से भारतीय कामगारों के लिए एक बड़ा डेस्टिनेशन रहा है। लेकिन अब बात सिर्फ लेबर तक सीमित नहीं है। स्किल्ड प्रोफेशनल्स, इंजीनियर्स, आईटी एक्सपर्ट्स, डॉक्टर, टीचर्स—इन सभी के लिए ओमान में काम करने के रास्ते ज्यादा आसान हो सकते हैं। यह न सिर्फ रोजगार के नए अवसर खोलेगा, बल्कि रेमिटेंस के जरिए भारत की अर्थव्यवस्था को भी मजबूती देगा।

यहां एक और रणनीतिक पहलू छिपा हुआ है। ओमान सिर्फ एक देश नहीं है, बल्कि एक गेटवे है। यह पश्चिम एशिया और अफ्रीका के बीच एक महत्वपूर्ण लिंक है। अगर भारतीय कंपनियां ओमान में अपनी मौजूदगी मजबूत करती हैं, तो उन्हें पूरे रीजन तक पहुंचने का एक रास्ता मिल सकता है। यानी ओमान भारत के लिए सिर्फ एक ट्रेड पार्टनर नहीं, बल्कि एक लॉन्चपैड बन सकता है।

अब इस डील के टाइमिंग पर गौर करना भी जरूरी है। जब दुनिया के कई बड़े देश टैरिफ बढ़ाने की बात कर रहे हैं, जब अमेरिका जैसे देश अपने मार्केट को बंद करने की दिशा में कदम उठा रहे हैं, उस वक्त भारत का एक नया FTA साइन करना यह दिखाता है कि भारत अपनी ट्रेड स्ट्रैटेजी को लंबी दूरी के नजरिए से देख रहा है। भारत यह समझता है कि ग्लोबल सप्लाई चेन बदल रही हैं और जो देश समय रहते नए पार्टनरशिप बनाएंगे, वही आगे बढ़ेंगे।

FTA का एक और कम चर्चित लेकिन बहुत अहम पहलू होता है—नॉन-टैरिफ बैरियर्स। कई बार टैक्स से ज्यादा दिक्कत सर्टिफिकेशन, स्टैंडर्ड्स और अप्रूवल्स की होती है। किसी देश में सामान बेचने के लिए दर्जनों परमिशन, टेस्ट और कागजी प्रक्रिया पूरी करनी पड़ती है। FTA के तहत इन प्रक्रियाओं को आसान किया जाता है। यानी भारतीय कंपनियों को ओमान में बिजनेस करने में कम समय, कम खर्च और कम झंझट होगा।

यह समझौता Investment के लिए भी दरवाजे खोलता है। ओमान ने कई सेक्टर्स में भारतीय कंपनियों को 100 प्रतिशत Foreign Direct Investment की अनुमति देने का प्रावधान रखा है। इसका मतलब यह है कि भारतीय कंपनियां वहां पूरी तरह अपने दम पर बिजनेस खड़ा कर सकती हैं। इससे सिर्फ व्यापार नहीं बढ़ेगा, बल्कि टेक्नोलॉजी ट्रांसफर, लोकल एम्प्लॉयमेंट और लॉन्ग-टर्म पार्टनरशिप भी मजबूत होगी।

अब सवाल यह भी है कि क्या हर FTA अपने आप में फायदेमंद होता है? इतिहास बताता है कि नहीं। FTA तभी फायदेमंद होता है, जब देश अपनी तैयारी के साथ उसमें उतरता है। भारत के लिए यह डील एक मौका है, लेकिन साथ ही एक जिम्मेदारी भी है। भारतीय एक्सपोर्टर्स को क्वालिटी, टाइमिंग और इंटरनेशनल स्टैंडर्ड्स पर खरा उतरना होगा। सिर्फ टैक्स कम हो जाने से काम नहीं चलेगा, अगर प्रोडक्ट या सर्विस ग्लोबल लेवल की न हो।

यह FTA भारत के छोटे और मझोले कारोबारियों के लिए भी एक बड़ा अवसर हो सकता है। टेक्सटाइल, लेदर और एग्रीकल्चर जैसे सेक्टर्स में भारत के लाखों MSMEs काम करते हैं। अगर सही सपोर्ट और इंफॉर्मेशन दी जाए, तो ये छोटे कारोबारी भी ओमान जैसे मार्केट में अपनी पहचान बना सकते हैं। यही वो जगह है जहां सरकार और इंडस्ट्री को मिलकर काम करना होगा।

एक और दिलचस्प पहलू है सामाजिक सुरक्षा का मुद्दा। इस समझौते में भविष्य में सोशल सिक्योरिटी एग्रीमेंट पर बातचीत का रास्ता खुला रखा गया है। इसका मतलब यह है कि भविष्य में भारतीय कामगारों को ओमान में काम करते हुए सोशल सिक्योरिटी के बेहतर लाभ मिल सकते हैं, और डबल कंट्रीब्यूशन जैसी समस्याओं से राहत मिल सकती है। यह दिखाता है कि यह डील सिर्फ बिजनेस नहीं, बल्कि लोगों के जीवन से भी जुड़ी हुई है।

अगर बड़ी तस्वीर में देखें, तो भारत–ओमान FTA भारत की उस सोच को दर्शाता है, जिसमें वह अलग-अलग रीजन में अलग-अलग स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप बना रहा है। एक तरफ भारत यूरोप और एशिया के साथ समझौते कर रहा है, दूसरी तरफ मिडिल ईस्ट और अफ्रीका में अपनी पकड़ मजबूत कर रहा है। यह डाइवर्सिफिकेशन भविष्य में भारत को किसी एक मार्केट पर निर्भर रहने से बचाएगा।

Conclusion

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