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IMF की असली ताक़त — कंगाल पाकिस्तान का बड़ा ख़्वाब: Fighter Jets बेचकर क्या सच में मिलेगी आर्थिक आज़ादी? 2026

IMF

एक ऐसा देश, जिसकी तिजोरी लगभग खाली है, जहां हर कुछ महीनों में सरकार international monetary fund की किस्त का इंतज़ार करती है, जहां महंगाई आम आदमी की सांसें रोक रही है… और उसी देश का एक मंत्री टीवी कैमरे के सामने बैठकर कहता है—“अब हमें IMF की ज़रूरत नहीं पड़ेगी।” सुनकर लगता है जैसे कोई इंसान डूबते हुए समंदर में खड़े होकर कह रहा हो—“मुझे तैरना नहीं आता, लेकिन आज मैं ओलंपिक जीतूंगा।” सवाल ये नहीं है कि पाकिस्तान ने ऐसा बयान दिया… सवाल ये है कि इतना confidence आखिर आया कहां से?

आपको बता दें कि पाकिस्तान की आर्थिक हालत कोई छिपी हुई बात नहीं है। वहां की सरकार भी जानती है, सेना भी जानती है, और वहां की आम जनता तो रोज़ अपनी ज़िंदगी में इसका असर महसूस करती है। फिर भी पाकिस्तान की राजनीति और बयानबाज़ी का एक पुराना DNA है—ground reality चाहे कितनी भी खराब हो, बात हमेशा “greatness” की होगी। इसी DNA का ताज़ा नमूना बने हैं पाकिस्तान के रक्षा मंत्री, जिनका बयान इन दिनों सोशल मीडिया से लेकर न्यूज़ डिबेट तक हर जगह घूम रहा है।

टीवी स्टूडियो की रोशनी में बैठे एक मंत्री, कैमरे की तरफ देखते हुए, पूरे confidence के साथ कहते हैं कि अगले छह महीनों में पाकिस्तान को IMF से मदद की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। ये कोई off-camera comment नहीं था। ये कोई slip of tongue भी नहीं था। ये एक calculated बयान था। और जब बयान calculated होता है, तो उसके पीछे कोई calculation भी होती है। सवाल बस इतना है—क्या ये calculation हकीकत पर आधारित है या फिर सिर्फ ख्वाबों पर?

पाकिस्तान का इतिहास उठाकर देखिए तो पता चलता है कि जब भी वहां हालात बिगड़ते हैं, वहां के हुक्मरान या तो भारत को दोष देते हैं, या फिर सेना की ताकत के किस्से सुनाने लगते हैं। इस बार भी कुछ अलग नहीं हुआ। बयान के पीछे जो narrative गढ़ा गया, वो ये था कि भारत के साथ हालिया टकराव के बाद पूरी दुनिया ने पाकिस्तान की military strength देखी है। और उसी “strength” के दम पर अब पाकिस्तान fighter jets बेचकर अपनी economy को संभाल सकता है।

यहीं से कहानी असली दिलचस्प मोड़ लेती है। क्योंकि जिस टकराव को पाकिस्तान अपनी “victory story” की तरह पेश कर रहा है, उसी टकराव में उसकी असलियत सबसे ज़्यादा उजागर हुई थी। भारत ने एक targeted military operation के ज़रिए साफ संदेश दिया था कि आतंकवाद और उसके infrastructure को बख्शा नहीं जाएगा। ये कोई symbolic action नहीं था। ये ground पर किया गया, precise और decisive ऑपरेशन था। और इस ऑपरेशन में पाकिस्तान को जो नुकसान हुआ, वो सिर्फ physical नहीं था… वो psychological भी था।

पाकिस्तान और उसके कब्ज़े वाले इलाकों में मौजूद आतंकी ठिकानों को तबाह किया गया। वो ठिकाने, जिनके बारे में सालों से कहा जाता रहा कि “ये सिर्फ camps नहीं हैं।” ट्रेनिंग centers, launch pads, logistics hubs—सब कुछ एक-एक करके मिट्टी में मिला दिया गया। ये वही जगहें थीं, जिनका इस्तेमाल दशकों से भारत के खिलाफ proxy war चलाने में किया जाता रहा था। और जब ये ढांचा टूटा, तो उसके साथ पाकिस्तान की एक बहुत बड़ी strategic myth भी टूटी।

लेकिन पाकिस्तान की राजनीति में हार को हार कहने की परंपरा नहीं है। वहां हार को भी victory की तरह बेचने की कोशिश की जाती है। यही वजह है कि उसी episode को अब fighter jet marketing का proof बताया जा रहा है। कहा जा रहा है कि “दुनिया ने देखा कि पाकिस्तान की सेना कितनी capable है।” सवाल ये है—दुनिया ने क्या सच में वही देखा, जो पाकिस्तान दिखाना चाहता है?

असलियत ये है कि इस पूरे घटनाक्रम के बाद पाकिस्तान के कई airbases को नुकसान पहुंचा। उसकी air defense capability पर सवाल उठे। उसके fighter jets की survivability पर global defense analysts ने खुलकर doubts जताए। लेकिन इन सब बातों का ज़िक्र पाकिस्तान के TV studios में नहीं होता। वहां सिर्फ एक ही लाइन चलती है—“हमने दुनिया को दिखा दिया।” अब आते हैं उस confidence के असली source पर, जिसकी वजह से ये बयान दिया गया।

हाल के दिनों में पाकिस्तान को एक छोटा सा diplomatic boost ज़रूर मिला। एक पड़ोसी देश के एयर force chief पाकिस्तान पहुंचे। Military protocol के तहत meetings हुईं, photos खिंचीं, statements आए। और इन statements में ये कहा गया कि उस देश की वायुसेना पाकिस्तान के JF-17 fighter jets में “interest” दिखा रही है। ध्यान दीजिए—interest. Deal नहीं, order नहीं, सिर्फ interest.

लेकिन पाकिस्तान की domestic politics में interest को deal और deal को revolution बना दिया जाता है। यही हुआ यहां भी। सोशल मीडिया पर headlines चलने लगीं—“Pakistan’s fighter jets in demand.” और यहीं से IMF से आज़ादी के सपने बुनने शुरू हो गए। अब ज़रा रुककर सोचिए। एक fighter jet बेचने से कितना पैसा आता है? और उस पैसे से क्या किसी देश की IMF dependency खत्म हो सकती है? IMF का मतलब सिर्फ loan नहीं होता। IMF का मतलब होता है—foreign reserves support, policy credibility, investor confidence, balance of payments stability. ये सब किसी एक defense deal से overnight नहीं बदल जाता।

पाकिस्तान की economy की सबसे बड़ी problem ये नहीं है कि उसके पास resources नहीं हैं। Problem ये है कि उसकी priorities लगातार गलत रही हैं। दशकों तक economy से ज़्यादा focus security establishment पर रहा। Education, healthcare, manufacturing, exports—सब पीछे छूटते गए। और जब economy कमजोर होती गई, तो IMF एक habit बन गया। हर crisis में वही दरवाज़ा खटखटाया गया।

आज पाकिस्तान दुनिया के सबसे ज़्यादा कर्ज़ में डूबे देशों में गिना जाता है। External debt, domestic debt, rollover obligations—हर तरफ pressure है। हर कुछ महीनों में reserves dangerously low levels पर पहुंच जाते हैं। Import bills चुकाने के लिए भी IMF की tranche का इंतज़ार करना पड़ता है। ऐसे में ये कहना कि “अब हमें IMF की ज़रूरत नहीं पड़ेगी,” ground reality से ज़्यादा fantasy लगता है।

IMF से मिलने वाला पैसा भी free नहीं होता। उसके साथ reforms की लंबी list आती है। Subsidies cut करने की शर्तें, taxes बढ़ाने की मांग, energy prices का rationalization—ये सब पाकिस्तान की politics के लिए painful होता है। यही वजह है कि हर बार IMF को publicly criticize किया जाता है, लेकिन privately उसी IMF के दरवाज़े पर सबसे पहले पहुंचा जाता है।

अब पाकिस्तान के सामने एक और challenge है—credibility. International markets में किसी भी देश की credibility उसकी statements से नहीं, उसके actions से बनती है। जब एक देश बार-बार loan defaults के कगार पर पहुंचता है, policies बार-बार बदलता है, और political instability लगातार बनी रहती है, तो investor भरोसा खो देता है। ऐसे में एक-दो defense deals से perception overnight नहीं बदलता। JF-17 fighter jet की अपनी सीमाएं हैं।

ये कोई cutting-edge fifth-generation aircraft नहीं है। ये एक affordable, entry-level fighter है, जिसे कुछ देशों की specific जरूरतों के हिसाब से design किया गया है। इसका market niche छोटा है। और defense market में buyer सिर्फ jet नहीं खरीदता… वो ecosystem खरीदता है—maintenance, spare parts, training, upgrades, long-term support. यहां पाकिस्तान की capacity पर भी सवाल उठते हैं।

अब ज़रा IMF angle को और गहराई से समझिए। IMF सिर्फ bailout नहीं देता, वो time खरीदकर देता है। Time ताकि देश reforms कर सके। Pakistan ने वो time बार-बार लिया, लेकिन reforms आधे-अधूरे ही रहे। Tax base widen नहीं हुआ। Elite capture बनी रही। Informal economy formal नहीं हो पाई। यही वजह है कि हर कुछ साल बाद वही संकट लौट आता है।

इस पूरे narrative में सबसे दुखद स्थिति पाकिस्तान की आम जनता की है। Inflation, unemployment, currency depreciation—इन सबका बोझ आम आदमी उठाता है। जब मंत्री fighter jets बेचकर IMF से आज़ादी के सपने दिखाते हैं, तब ground पर खड़ा आम नागरिक सोचता है—“क्या इससे मेरी ज़िंदगी बदलेगी?” और अक्सर जवाब होता है—नहीं।

Confidence तब dangerous बन जाता है, जब वो delusion में बदल जाए। Healthy confidence economy को आगे बढ़ाता है। Delusional confidence economy को और गहरे गड्ढे में धकेल देता है। Fighter jets बेचने का सपना बुरा नहीं है। लेकिन उसे IMF से आज़ादी का shortcut समझ लेना खतरनाक है।

History हमें यही सिखाती है कि sustainable growth missiles और jets से नहीं, बल्कि factories, exports, education और stable policies से आती है। जब तक पाकिस्तान इस basic truth को स्वीकार नहीं करता, तब तक IMF से दूरी सिर्फ बयान में रहेगी, हकीकत में नहीं। और शायद यही इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा irony है।

Conclusion

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