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HDFC ने दिखाई पारदर्शिता की मिसाल: CEO पर आरोपों के बीच बैंक की छवि रही मजबूत! 2025

HDFC

एक ऐसा नाम जिसे बैंकिंग की दुनिया में भरोसे की मिसाल माना जाता है। एक ऐसी शख्सियत जिन्होंने देश के सबसे बड़े निजी बैंकों में से एक को बुलंदियों तक पहुंचाया। और अब, उन पर रिश्वतखोरी और धोखाधड़ी के संगीन आरोप लगे हैं। क्या वाकई ये वही शख्स हैं जिनकी इमेज इतनी बेदाग मानी जाती थी? या फिर इसके पीछे है किसी की सोची-समझी साजिश?

HDFC बैंक के सीईओ और एमडी शशिधर जगदीशन पर लगाए गए इन आरोपों ने पूरे कॉरपोरेट सेक्टर को हिला कर रख दिया है। अचानक ही उनकी छवि, जो अब तक एक प्रेरणादायक नेता की थी, एक विवादित शख्सियत में बदलती नजर आ रही है। मीडिया से लेकर सोशल मीडिया तक, हर जगह चर्चाओं का दौर जारी है और सभी जानना चाहते हैं कि आखिर इस कहानी की सच्चाई क्या है।

शशिधर जगदीशन – ये नाम HDFC बैंक की पहचान बन चुका है। आज से नहीं, बल्कि पिछले 29 सालों से वो इस बैंक की रीढ़ की हड्डी जैसे हैं। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत डॉयचे बैंक मुंबई से की थी, लेकिन असली सफर शुरू हुआ 1996 में, जब उन्होंने HDFC बैंक को जॉइन किया। उस समय बैंक अपने शुरुआती चरणों में था।

शशिधर ने शुरुआत की बैंक के फाइनेंस डिवीजन में बतौर मैनेजर और फिर 1999 में फाइनेंस हेड बन गए। साल 2008 में उन्हें बनाया गया बैंक का CFO यानी चीफ फाइनेंशियल ऑफिसर। यह एक ऐसा पद था जो किसी भी बैंक की आंतरिक वित्तीय रणनीतियों को नियंत्रित करता है, और शशिधर ने इस पद को पूरी निष्ठा से निभाया।

उनकी काबिलियत का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि साल 2020 में उन्हें, देश के सबसे बड़े बैंक HDFC का सीईओ और मैनेजिंग डायरेक्टर बनाया गया। उन्होंने आदित्य पुरी की जगह ली, जो बैंक के सबसे लंबे समय तक सेवा देने वाले सीईओ थे। शशिधर की शैक्षणिक योग्यता भी उतनी ही प्रभावशाली है—मुंबई यूनिवर्सिटी से फिजिक्स में ग्रेजुएशन और उसके बाद यूनिवर्सिटी ऑफ शेफ़ील्ड से मनी, बैंकिंग और फाइनेंस में मास्टर्स।

इसके अलावा वे चार्टर्ड अकाउंटेंट भी हैं। इन सबके अलावा, उन्होंने देश और दुनिया की आर्थिक नीतियों को समझने और उन्हें भारतीय सन्दर्भ में लागू करने की गहरी समझ विकसित की, जिससे बैंक को नई ऊंचाइयों तक ले जाया जा सका।

उनके नेतृत्व में बैंक ने कई बड़े डिजिटल बदलाव किए। वित्तीय पहुंच को विस्तार मिला और बैंक ने सस्टेनेबिलिटी पर भी गंभीरता से काम किया। शायद यही कारण था कि 2024 में उन्हें एशिया पैसिफिक का बैंक सीईओ ऑफ द ईयर अवॉर्ड मिला। इस अवॉर्ड को बैंकिंग इंडस्ट्री में एक सम्मान के तौर पर देखा जाता है और इसे प्राप्त करना इस बात का संकेत था कि शशिधर सिर्फ एक मैनेजर नहीं, बल्कि एक दूरदर्शी लीडर हैं। उन्होंने अपने कार्यकाल में बैंक के डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन को गति दी, जिससे ग्रामीण और पिछड़े इलाकों में भी लोगों को बैंकिंग सेवाएं मिल सकीं।

लेकिन अब इस छवि पर दाग लगते दिख रहे हैं। मुंबई के लीलावती अस्पताल ट्रस्ट के मेहता परिवार ने शशिधर पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन पर F I R दर्ज हुई है और आरोप लगाए गए हैं कि उन्होंने ट्रस्ट के एक पूर्व सदस्य के पिता से, 2 करोड़ की रिश्वत ली ताकि ट्रस्ट पर नियंत्रण हासिल किया जा सके।

ट्रस्ट की ओर से इस आरोप के समर्थन में एक हाथ से लिखी डायरी की एंट्रीज पेश की गई हैं। ये डायरी एंट्रीज उस समय की हैं जब ट्रस्ट में अंदरूनी विवाद चल रहा था और नई सदस्यता को लेकर कई पुराने ट्रस्टी असंतुष्ट थे। आरोप लगाने वालों का कहना है कि शशिधर ने अपने प्रभाव का दुरुपयोग कर ट्रस्ट के कामकाज में हस्तक्षेप किया।

यह आरोप केवल एक व्यक्ति पर नहीं, बल्कि HDFC बैंक की साख पर सीधा हमला है। आरोप ऐसे समय में लगाए गए हैं जब बैंक पहले से ही कई रणनीतिक मोर्चों पर काम कर रहा है। HDFC बैंक ने इन आरोपों को पूरी तरह खारिज कर दिया है। बैंक ने इन्हें निराधार, दुर्भावनापूर्ण और एक साजिश बताया है। बैंक का कहना है कि यह सब कुछ एक साजिश का हिस्सा है, ताकि उन पर दबाव बनाया जा सके और पुराने कर्जों की वसूली प्रक्रिया को रोका जा सके।

बैंक का दावा है कि लीलावती ट्रस्ट से जुड़े मेहता परिवार ने बैंक से भारी कर्ज लिया था, जिसे वो अब तक चुकता नहीं कर पाए हैं। HDFC बैंक के अनुसार, यह पूरा मामला उस कर्ज से बचने के लिए बनाया गया ड्रामा है। बैंक ने इस संबंध में एक विस्तृत टाइमलाइन भी जारी की है। इस टाइमलाइन में दिखाया गया है कि कैसे साल 1995 से शुरू हुआ यह ऋण संबंध, धीरे-धीरे डिफॉल्ट की ओर बढ़ता चला गया और अंततः अब 2025 तक भी बकाया बना हुआ है। बैंक का दावा है कि इस तरह के आरोपों के पीछे एकमात्र मकसद बैंक की साख को नुकसान पहुंचाना और कानूनी कार्रवाई से बचना है।

इस टाइमलाइन के मुताबिक, मेहता परिवार की कंपनी Splendour Gems Ltd ने 1995 में HDFC और अन्य बैंकों से कर्ज लिया था। 2001 में यह कंपनी डिफॉल्टर घोषित हो गई थी। 2004 में डेब्ट रिकवरी ट्रिब्यूनल ने HDFC बैंक को कर्ज वसूली का प्रमाणपत्र दे दिया था। लेकिन इसके बावजूद 2025 तक कंपनी पर 65 करोड़ रुपये का बकाया बना रहा।

बैंक का कहना है कि इतने वर्षों बाद भी कर्ज चुकाने में टालमटोल करना और अब बैंक अधिकारियों पर उल्टा आरोप लगाना, इस बात का प्रमाण है कि सच्चाई कहीं और है। यह ट्रस्टी परिवार अपनी आर्थिक जिम्मेदारियों से बचना चाहता है और इसी वजह से अब मीडिया और कानून का सहारा लेकर प्रेशर बना रहा है।

बैंक का कहना है कि यह सिर्फ HDFC बैंक का मामला नहीं है, बल्कि Splendour Gems Ltd ने कई अन्य बैंकों और Financial institutions से भी कर्ज लिया और चुकाया नहीं। अब जब बैंक वसूली की दिशा में सख्त कदम उठा रहा है, तब यह कथित रिश्वत का मामला सामने लाया गया है ताकि कानूनी कार्रवाई को रोका जा सके। इस प्रकार, यह मामला अब केवल एक व्यक्तिगत आरोप नहीं रहा, बल्कि यह एक रणनीतिक लड़ाई में तब्दील हो चुका है जिसमें दोनों पक्ष अपने-अपने तर्कों के साथ मैदान में हैं।

इस पूरे मामले में दो पहलू साफ नजर आते हैं। एक, HDFC बैंक का दावा कि मेहता परिवार उन्हें जानबूझकर बदनाम कर रहा है ताकि कर्ज से बचा जा सके। दूसरा, मेहता परिवार का आरोप कि बैंक के सीईओ ने ट्रस्ट में दखल के लिए रिश्वत ली। सवाल ये है कि क्या ये सचमुच रिश्वत का मामला है या फिर यह सिर्फ कानूनी लड़ाई को एक अलग मोड़ देने की रणनीति है? इस सवाल का उत्तर फिलहाल किसी के पास नहीं है, लेकिन यह स्पष्ट है कि मामला अब केवल कानूनी दायरों में नहीं रहा, बल्कि इसका असर बैंकिंग सेक्टर की साख पर भी पड़ रहा है।

शशिधर जगदीशन जैसे व्यक्ति पर इस तरह के आरोप लगना न केवल चौंकाने वाला है बल्कि बैंकिंग जगत के लिए एक गंभीर संकेत भी है। आज जब पूरी दुनिया भारतीय बैंकों की पारदर्शिता की मिसाल देती है, ऐसे समय में इस तरह का विवाद HDFC जैसे प्रतिष्ठित बैंक की विश्वसनीयता पर सवाल उठा सकता है। यदि यह मामला और गहराता है तो न केवल बैंक को बाजार में नुकसान झेलना पड़ सकता है, बल्कि Investors का विश्वास भी डगमगा सकता है।

HDFC बैंक ने प्रेस स्टेटमेंट में कहा है कि उनके अधिकारियों और बैंक को कुछ गलत मंशा वाले लोग निशाना बना रहे हैं। उनका मकसद केवल इतना है कि बैंक की ओर से किए जा रहे वसूली प्रयासों को रोका जाए। बैंक ने यह भी कहा कि यह मामला पूरी तरह से तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश करने का प्रयास है। ऐसे मामलों से बैंक की छवि को जानबूझकर नुकसान पहुंचाने की कोशिश की जा रही है, ताकि ट्रस्टी परिवार को कानूनी राहत मिल सके।

हालांकि अब यह मामला जांच एजेंसियों और कोर्ट की चौखट पर पहुंच चुका है। सच क्या है, यह आने वाला समय और कानूनी प्रक्रिया तय करेगी। लेकिन जो भी हो, इस विवाद ने बैंकिंग और कॉरपोरेट सेक्टर दोनों को सोचने पर मजबूर कर दिया है कि, क्या इस तरह के आरोप एक व्यक्ति की छवि और संस्था की साख दोनों को खत्म कर सकते हैं?

Conclusion

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