एक वक्त था जब भारत के तेल टैंकर Gulf countries के पोर्ट पर लाइन लगाए खड़े रहते थे। सऊदी अरब, इराक, यूएई—यही वो नाम थे जिनके दम पर भारत की ऊर्जा ज़रूरतें पूरी होती थीं। लेकिन अब तस्वीर पूरी तरह से बदल चुकी है। अब भारत के तेल जहाज़ किसी और दिशा में जा रहे हैं। वो दिशा है रूस। हां, वही रूस जो पश्चिमी दुनिया की नज़रों में आज एक अलग-थलग देश बन चुका है, लेकिन भारत के लिए वो बन गया है एक भरोसेमंद ऊर्जा साथी। और इसी दोस्ती ने 9 देशों की नींद उड़ा दी है।
वो 9 देश कोई और नहीं बल्कि खाड़ी के वो देश हैं, जिनसे भारत दशकों से तेल खरीदता रहा है। अब जब भारत ने रूस की तरफ रुख किया है, तो Gulf countries की अर्थव्यवस्थाओं को झटका लगना तय है। ये झटका इतना बड़ा है कि इसका असर सिर्फ व्यापार तक नहीं, बल्कि Geopolitical समीकरणों तक महसूस किया जा रहा है। आज हम इसी विषय पर गहराई में चर्चा करेंगे।
भारत-रूस की तेल साझेदारी अब एक नया रिकॉर्ड बना रही है। मई 2025 में भारत ने रूस से 19.6 लाख बैरल प्रतिदिन तेल Import किया। ये आंकड़ा पिछले 10 महीनों में सबसे ऊंचा है। और यह केवल एक संयोग नहीं, बल्कि भारत की सुनियोजित ऊर्जा नीति का हिस्सा है। रूस से सस्ते दाम पर तेल मिलना, जब पूरी दुनिया में कच्चे तेल की कीमतें ऊंचाई पर हैं, भारत के लिए एक आर्थिक मास्टरस्ट्रोक जैसा है। वैश्विक बेंचमार्क जैसे ब्रेंट क्रूड की तुलना में रूस का यूराल क्रूड भारत को भारी छूट में मिल रहा है। और भारत इस अवसर को भुनाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहा।
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल Importer देश है। हर दिन लगभग 51 लाख बैरल तेल विदेशों से आता है, जिससे देश की रिफाइनरियां पेट्रोल, डीज़ल और अन्य ईंधन बनाती हैं। इस खपत को पूरा करने के लिए भारत को अपनी तेल सोर्सिंग को लेकर बेहद सतर्क रहना होता है। पहले Gulf countries की हिस्सेदारी सबसे ज़्यादा थी। लेकिन अब रूस ने सबको पीछे छोड़ दिया है। रूस की वर्तमान में भारत की कुल तेल आपूर्ति में 38% से ज़्यादा हिस्सेदारी है, जो कभी 2% से भी कम थी। यह बदलाव अचानक नहीं हुआ, बल्कि वैश्विक घटनाओं के परिणामस्वरूप भारत की व्यावहारिक रणनीति के तहत लिया गया निर्णय है।
इराक अब दूसरे नंबर पर है, जिससे भारत को प्रतिदिन लगभग 12 लाख बैरल कच्चा तेल मिलता है। सऊदी अरब अब तीसरे स्थान पर है, जो 6.15 लाख बैरल प्रतिदिन तेल भेजता है। इसके बाद यूएई और अमेरिका का नंबर आता है, जिनसे क्रमशः 4.9 लाख और 2.8 लाख बैरल प्रतिदिन की सप्लाई होती है। ये गिरती हुई संख्या साफ बताती है कि भारत अब अपना दांव उन देशों पर लगा रहा है जो ज्यादा लचीलापन और कम कीमत दे रहे हैं। यही कारण है कि Gulf countries की चिंता अब सिर्फ आर्थिक नहीं, बल्कि रणनीतिक भी हो चली है।
रूस से भारत का तेल संबंध अचानक शुरू नहीं हुआ। इसकी शुरुआत 2022 में हुई, जब रूस ने यूक्रेन पर हमला किया और पश्चिमी देशों ने रूस पर सख्त प्रतिबंध लगा दिए। यूरोप और अमेरिका ने रूसी तेल से दूरी बना ली, जिससे रूस को अपने तेल का नया बाजार तलाशना पड़ा। यहीं भारत सामने आया—एक ऐसा देश जो अपनी ऊर्जा ज़रूरतों को प्राथमिकता देता है, और जो अंतरराष्ट्रीय दबाव के बजाय अपने राष्ट्रीय हितों के हिसाब से फैसले करता है। भारत ने रूस को वही ऑफर दिया जिसकी उसे ज़रूरत थी: एक विशाल उपभोक्ता और एक व्यावसायिक दृष्टिकोण से मजबूत भागीदार।
सुमित रितोलिया, जो केप्लर में रिफाइनिंग और मॉडलिंग के प्रमुख विश्लेषक हैं, उन्होंने बताया कि भारत की वर्तमान तेल रणनीति इस बात को उजागर करती है कि देश अब केवल पारंपरिक सोर्सिंग पर निर्भर नहीं रहना चाहता। रूस से Import की यह नीति न केवल भारत को आर्थिक रूप से फायदे में रखती है, बल्कि यह उसे global platform पर एक स्वतंत्र नीति निर्माता के रूप में भी स्थापित करती है। रितोलिया के मुताबिक, ब्रेंट या दुबई ग्रेड की तुलना में रूस से मिल रहा यूराल क्रूड न केवल सस्ता है, बल्कि उसका लॉजिस्टिक और रिफाइनिंग प्रोसेस भी भारत के लिए अधिक अनुकूल है।
अब जब भारत लगातार रूस से तेल खरीद रहा है, तो सवाल ये भी उठता है कि क्या इससे पश्चिमी देशों के साथ भारत के संबंध प्रभावित हो रहे हैं? जवाब थोड़ा जटिल है। अमेरिका ने कई बार भारत से कहा है कि वो रूस से तेल न खरीदे, लेकिन भारत ने हर बार यही जवाब दिया है कि राष्ट्रीय हित सर्वोपरि हैं। भारत का यह रुख एक नई प्रकार की कूटनीति को दर्शाता है, जिसमें वह किसी भी गुट में शामिल हुए बिना अपनी प्राथमिकताओं पर काम कर रहा है। पश्चिमी देश इस रुख से असहज हैं, लेकिन वे भी जानते हैं कि भारत को नज़रअंदाज करना संभव नहीं है।
Gulf countries के लिए यह स्थिति बेहद चुनौतीपूर्ण हो चुकी है। दशकों तक भारत उनके लिए सबसे बड़ा तेल ग्राहक था। उनकी अर्थव्यवस्थाएं भारत से होने वाले निर्यात पर निर्भर थीं। लेकिन अब जब भारत रूस की ओर देख रहा है, तो इन देशों को न केवल आर्थिक नुकसान हो रहा है, बल्कि उनकी रणनीतिक पकड़ भी कमजोर हो रही है। भारत को रिअलाइन करना अब उनके लिए आसान नहीं होगा, क्योंकि रूस ने भारत को जो मूल्य और स्थिरता दी है, वह Gulf countries फिलहाल नहीं दे पा रहे।
भारत की ऊर्जा नीति अब ‘विविधता’ और ‘मूल्य व्यावहारिकता’ पर आधारित है। यानी जहां से सस्ता और भरोसेमंद तेल मिलेगा, भारत वहीं से खरीदेगा—चाहे वह रूस हो, अफ्रीका हो या लैटिन अमेरिका। यह सोच Gulf countries के लिए एक सख्त संदेश है: सिर्फ पारंपरिक रिश्ते अब पर्याप्त नहीं हैं, उन्हें प्रतिस्पर्धी भी बनना होगा। और जब तक वे ऐसा नहीं करते, भारत अपनी रणनीति से पीछे नहीं हटेगा।
भारत की इस रणनीति से न केवल उसकी ऊर्जा सुरक्षा मजबूत हुई है, बल्कि उसे वैश्विक मंच पर एक निर्णायक शक्ति के रूप में भी स्थापित किया है। अब भारत केवल तेल का खरीदार नहीं, बल्कि तेल बाज़ार का ट्रेंड सेटर बनता जा रहा है। भारत की इस रणनीति ने उन 9 देशों को सोचने पर मजबूर कर दिया है, जिन्होंने कभी नहीं सोचा था कि भारत उनसे मुंह मोड़ सकता है। लेकिन यही तो असली कूटनीति है—जहां दोस्ती भी व्यापारिक समझदारी के आधार पर तय होती है।
इस पूरी कहानी में सबसे दिलचस्प बात ये है कि रूस, जो कभी भारत के तेल बाज़ार में केवल एक नाम था, अब वहाँ का सबसे बड़ा खिलाड़ी बन चुका है। यह बदलाव सिर्फ आंकड़ों का नहीं, बल्कि विश्वास, समझदारी और रणनीति का है। और जब दुनिया के बाकी हिस्से राजनीतिक दबावों में फंसे हैं, भारत उस राह पर चल रहा है जिसे वो खुद चुनता है—बिना किसी झुकाव के, केवल अपने हितों को ध्यान में रखते हुए।
तो अगली बार जब आप पेट्रोल पंप पर जाएं और थोड़ा सस्ता पेट्रोल मिले, तो याद रखिए, उस एक बूंद तेल के पीछे भारत और रूस की एक बड़ी कहानी छिपी है—एक कहानी जो Gulf countries की नींद उड़ा रही है और भारत को ऊर्जा की लड़ाई में विजेता बना रही है।
Conclusion
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