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Gold की बढ़ती चमक — सेंट्रल बैंक कर रहे हैं रिकॉर्ड खरीदारी, पहले कभी ऐसा नहीं देखा गया! 2025

Gold

ज़रा सोचिए… एक ऐसा समय, जब दुनिया की अर्थव्यवस्था लगातार अस्थिरता से गुजर रही है — डॉलर की बादशाहत धीरे-धीरे डगमगा रही है, महंगाई कई देशों में नई ऊँचाइयों पर है, और बड़े-बड़े Investor अब पारंपरिक बाज़ारों से डरने लगे हैं। ऐसे दौर में दुनिया के सेंट्रल बैंक चुपचाप एक ही चीज़ की ओर झुक रहे हैं —Gold। वो Gold जिसे कभी सिर्फ़ ज़ेवर या दहेज का प्रतीक माना जाता था, आज वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था का सबसे सुरक्षित हथियार बन चुका है।

और सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इतनी तेज़ी से Gold खरीदने का दौर पहले कभी नहीं देखा गया। 2025 में सेंट्रल बैंकों द्वारा लगभग 900 टन सोना खरीदे जाने की उम्मीद है — यह बीते कई दशकों में सबसे बड़ी और सबसे आक्रामक गोल्ड परचेजिंग स्प्री है। सवाल सिर्फ़ इतना नहीं कि वो खरीद रहे हैं, असली सवाल यह है — क्यों? आखिर ऐसा क्या बदल गया है कि अब दुनिया की सरकारें डॉलर से ज़्यादा भरोसा सोने पर कर रही हैं?

दरअसल, Gold सिर्फ़ एक धातु नहीं, बल्कि “विश्वास का प्रतीक” है। जब किसी देश की करेंसी अस्थिर होती है, जब महंगाई बढ़ती है, या जब भू-राजनीतिक तनाव बढ़ते हैं — तो Gold उस संकट का जवाब बन जाता है। क्योंकि सोना किसी देश की नीति, किसी बैंक की गड़बड़ी, या किसी आर्थिक प्रतिबंध से प्रभावित नहीं होता। वह अपने मूल मूल्य पर अडिग रहता है। यही कारण है कि दुनिया भर के सेंट्रल बैंक, खासकर एशिया और मिडल ईस्ट के, सोने को अपनी मुद्रा रिज़र्व का सबसे अहम हिस्सा बना रहे हैं।

World Economic Forum के हालिया आंकड़े बताते हैं कि 76% सेंट्रल बैंकों का मानना है कि, आने वाले पाँच वर्षों में उनके पास सोने का अनुपात पहले से कहीं ज़्यादा होगा। वहीं 73% बैंकों का विश्वास है कि अमेरिकी डॉलर की वैश्विक हिस्सेदारी घटेगी। यानी कहानी अब साफ़ है — दुनिया अब डॉलर से निकलकर गोल्ड के युग में प्रवेश कर रही है। पिछले एक साल में ही सोने की कीमत में 50 से 65 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी दर्ज हुई है। जो लोग एक साल पहले इसे महंगा समझकर नहीं खरीद पाए, वो अब पछता रहे हैं। क्योंकि Gold महज एक Investment नहीं रहा, यह अब एक “आर्थिक कवच” बन चुका है।

सेंट्रल बैंकों का यह गोल्ड रश कुछ नया नहीं, लेकिन इसकी तीव्रता पहले कभी नहीं देखी गई। दरअसल, हर केंद्रीय बैंक का प्राथमिक उद्देश्य अपने देश की करेंसी को स्थिर रखना होता है। लेकिन जब वैश्विक अर्थव्यवस्था में डॉलर की स्थिरता पर सवाल उठने लगे, जब महंगाई लगातार बढ़े, और जब डिजिटल मुद्रा जैसी अनिश्चितताएँ सामने आने लगीं, तब सेंट्रल बैंकों ने समझ लिया — अब उन्हें किसी ठोस और भरोसेमंद एसेट की जरूरत है। और उस भरोसे का दूसरा नाम है — Gold।

Gold किसी देश या संस्थान का ऋणी नहीं होता। उसे न कोई डिफॉल्ट कर सकता है, न कोई प्रतिबंधित। यही कारण है कि जब रूस पर पश्चिमी देशों ने आर्थिक प्रतिबंध लगाए, तो दुनिया के कई देशों को एहसास हुआ — अगर कल हमारे साथ भी ऐसा हुआ तो? तभी से उन्होंने अपने foreign currency reserves में सोने की हिस्सेदारी बढ़ाना शुरू कर दिया।

इसे समझने के लिए एक दिलचस्प उदाहरण है — चीन। चीन ने पिछले 18 महीनों से लगातार Gold खरीदा है। उसका सेंट्रल बैंक — पीपल्स बैंक ऑफ चाइना — दुनिया का सबसे आक्रामक गोल्ड बायर बन गया है। वो यह सिर्फ़ Investment के लिए नहीं, बल्कि रणनीति के तहत कर रहा है। चीन जानता है कि अगर भविष्य में अमेरिका के साथ उसके रिश्ते और बिगड़ते हैं, तो डॉलर या अमेरिकी बॉन्ड पर निर्भर रहना उसके लिए खतरनाक साबित हो सकता है। इसलिए वह सोने को एक “shield asset” के रूप में इकट्ठा कर रहा है।

सोने की यह खरीद सिर्फ़ चीन तक सीमित नहीं। रूस, तुर्की, भारत, कतर, सिंगापुर और यहां तक कि पोलैंड और हंगरी जैसे यूरोपीय देश भी पिछले दो सालों में अपने गोल्ड रिज़र्व को दोगुना कर चुके हैं। भारत का सेंट्रल बैंक यानी Reserve Bank of India (RBI) भी इस सूची में शामिल है। भारत ने अपने foreign currency reserves का करीब 8% हिस्सा अब सोने में Investment किया है, जो पिछले एक दशक में सबसे अधिक है।

अब सवाल यह उठता है — क्या यह महज़ एक ट्रेंड है या इसके पीछे कोई गहरी रणनीति है? असल में, वैश्विक अर्थव्यवस्था आज कई संकटों से जूझ रही है। मंदी का खतरा बढ़ रहा है, डॉलर की वैल्यू में गिरावट दिख रही है, और कई देशों की मुद्रा कमजोर पड़ रही है। ऐसे माहौल में, जब किसी मुद्रा पर भरोसा डगमगाता है, तो देश सोने की ओर रुख करते हैं। क्योंकि Gold एकमात्र ऐसी संपत्ति है जिसे “किसी के वादे” पर नहीं, बल्कि “अपने अस्तित्व” पर भरोसा किया जा सकता है।

सोने में “counterparty risk” नहीं होता — यानी किसी दूसरे के फेल होने से इसका मूल्य नहीं गिरता। जबकि डॉलर, बॉन्ड या किसी डिजिटल करेंसी का मूल्य हमेशा उसके जारी करने वाले संस्थान पर निर्भर करता है। यही कारण है कि जब दुनिया अनिश्चित होती है, तो सोने की मांग बढ़ती है। अब आइए समझते हैं कि यह सब डॉलर की बादशाहत को कैसे चुनौती दे रहा है।

आज भी अमेरिकी डॉलर दुनिया के कुल foreign currency reserves का लगभग 58% हिस्सा रखता है। लेकिन यह हिस्सा हर साल घट रहा है। 2000 के दशक की शुरुआत में यह 70% के आसपास था। यानी बीते 20 सालों में डॉलर का प्रभाव 12% तक कम हो चुका है। इसके कई कारण हैं — अमेरिका की राजनीतिक अस्थिरता, बढ़ते कर्ज़, और वैश्विक वित्तीय प्रतिबंधों का डर। जब अमेरिका किसी देश पर प्रतिबंध लगाता है, तो वह उसके डॉलर अकाउंट्स को फ्रीज़ कर देता है। और इसी डर ने दुनिया के सेंट्रल बैंकों को यह सोचने पर मजबूर किया कि अगर कल हमारे साथ भी ऐसा हुआ तो क्या होगा?

Gold यहां एक “साइलेंट वेपन” की तरह उभरा है। यह किसी देश की मौद्रिक संप्रभुता यानी “Monetary Sovereignty” को मजबूत करता है। इसे घरेलू रूप से स्टोर किया जा सकता है, यह किसी एक देश की नीतियों से बंधा नहीं है, और सबसे बड़ी बात — इसे आप किसी भी समय दुनिया में कहीं भी बेच सकते हैं।

सोने की इस रणनीतिक वापसी का एक और पहलू है — डिजिटल मुद्रा का उदय। आज कई सेंट्रल बैंक “Central Bank Digital Currency (CBDC)” पर काम कर रहे हैं। लेकिन इन डिजिटल मुद्राओं के लिए भी एक स्थिर और भरोसेमंद बैकअप की जरूरत होती है। इसलिए विशेषज्ञ मानते हैं कि भविष्य में कई डिजिटल करेंसियाँ सोने से समर्थित होंगी। यानी गोल्ड फिर से “मॉनेटरी बेस” बन सकता है, जैसा कि सदियों पहले हुआ करता था।

इस पूरी कहानी में एक दिलचस्प राजनीतिक परत भी है। रूस और चीन जैसे देश अमेरिका के नेतृत्व वाले वित्तीय तंत्र से बाहर निकलने की कोशिश कर रहे हैं। BRICS समूह — जिसमें ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका शामिल हैं — अब अपनी एक वैकल्पिक मुद्रा प्रणाली पर विचार कर रहा है। और इस नई व्यवस्था की नींव भी “Gold Standard” पर रखी जा सकती है।

यानी धीरे-धीरे एक नया वैश्विक आर्थिक क्रम बन रहा है — जहां Gold फिर से केंद्र में लौट रहा है। अब ज़रा सोचिए, अगर हर सेंट्रल बैंक इतनी तेजी से सोना खरीद रहा है, तो इससे वैश्विक बाजार पर क्या असर पड़ेगा? सबसे पहले, इसका सीधा असर सोने की कीमतों पर पड़ रहा है। पिछले कुछ महीनों में सोने की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी देखी गई है, और कई विशेषज्ञ मानते हैं कि आने वाले दो वर्षों में यह कीमत 3,000 dollar प्रति औंस तक जा सकती है।

दूसरा बड़ा असर यह है कि आम Investor — चाहे वह छोटे स्तर का हो या संस्थागत — अब सेंट्रल बैंकों की दिशा में देख रहा है। अगर बैंक Gold खरीद रहे हैं, तो यह एक संकेत है कि दुनिया अस्थिर समय की तैयारी कर रही है। नतीजा यह कि लोग भी अपने पोर्टफोलियो में गोल्ड या गोल्ड-बेस्ड ETF जोड़ रहे हैं।

तीसरा असर भू-राजनीति पर है। जब सेंट्रल बैंक डॉलर से दूरी बनाते हैं, तो यह एक “आर्थिक विद्रोह” जैसा है। यह अमेरिका के लिए चेतावनी है कि उसकी वित्तीय शक्ति अब पहले जैसी निर्विवाद नहीं रही। और यही वह बदलाव है जो आने वाले दशकों में अंतरराष्ट्रीय शक्ति संतुलन को बदल सकता है।

सोने की इस बढ़ती मांग ने कई देशों को आत्मनिर्भर बनने की दिशा में भी प्रेरित किया है। भारत इसका एक उदाहरण है। भारत, जो दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा गोल्ड इंपोर्टर है, अब खुद सोने की रिफाइनिंग और रिज़र्व में आत्मनिर्भर बनने की कोशिश कर रहा है। रिजर्व बैंक लगातार गोल्ड बॉन्ड और डिजिटल गोल्ड जैसी योजनाओं को प्रोत्साहित कर रहा है, ताकि नागरिक भी इस “गोल्डन मूवमेंट” का हिस्सा बन सकें।

आर्थिक विशेषज्ञों का कहना है कि सेंट्रल बैंकों की यह खरीद सिर्फ़ monetary policy नहीं, बल्कि Strategic Realignment है। वे यह मान चुके हैं कि आने वाले दशक में आर्थिक युद्ध मुद्राओं से नहीं, बल्कि संसाधनों से लड़ा जाएगा — और Gold उन संसाधनों का “King Asset” होगा।

सोने की कहानी हजारों साल पुरानी है। यह तब भी मूल्यवान था जब कोई करेंसी नहीं थी। यह तब भी मूल्यवान रहा जब डॉलर पैदा हुआ। और अब, जब डिजिटल मुद्राएँ और क्रिप्टोकरेंसी जैसे नए प्रयोग सामने हैं, तब भी सोना अपनी जगह बनाए हुए है। शायद इसलिए क्योंकि Gold केवल एक आर्थिक तत्व नहीं — बल्कि एक “मानव विश्वास” है।

आज जब दुनिया अनिश्चितता के युग में है, जब एक ट्वीट से बाजार हिल जाता है, जब एक देश का कर्ज़ पूरी अर्थव्यवस्था को डुबो देता है — तब सेंट्रल बैंक फिर उसी चीज़ पर लौट आए हैं जो समय, सत्ता और सीमाओं से परे है — Gold.

तो अगली बार जब आप अखबार में देखें कि Gold की कीमत फिर नई ऊँचाई पर पहुंच गई है, तो याद रखिए — यह सिर्फ़ बाजार का खेल नहीं है। यह एक संकेत है कि दुनिया की अर्थव्यवस्था एक नए मोड़ पर खड़ी है। डॉलर की बादशाहत शायद अब अपने अंत की ओर बढ़ रही है, और Gold… फिर से “राजा” बनने की तैयारी कर रहा है।

Conclusion

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