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GM ने भारत में दिखाई दिलचस्पी: अब अमेरिका की ऑटो जायंट बनाएगी ‘मेक इन इंडिया’ को ग्लोबल ब्रांड! 2025

GM

ज़रा सोचिए… एक दिन आप सब्ज़ी मंडी जाते हैं, और आपको टमाटर, आलू, प्याज—हर चीज़ पर एक नई चमकदार सील लगी दिखती है—”जेनेटिकली मॉडिफाइड” यानी ‘GM’। आप थोड़ा चौंकते हैं, लेकिन दुकानदार कहता है—“भैया, अब तो सरकार की मंज़ूरी है… अमेरिका से डील हुई है।” अब सोचिए, यही सब्ज़ियां आप खाते हैं, यही अनाज से आपके बच्चों का खाना बनता है, और यही बीज अब आपके खेत में बोए जाते हैं।

लेकिन अगले साल…? वही बीज आप दोबारा नहीं बो सकते! आपको फिर से वही बीज खरीदने होंगे, उन्हीं विदेशी कंपनियों से। और अगर आपने मना किया, तो आपके खेतों की उपज ही बंद हो सकती है। क्या यह महज़ व्यापार है? या एक खामोश रणनीति—जिससे एक आज़ाद देश को धीरे-धीरे परोक्ष रूप से गुलाम बनाया जा रहा है? आज हम इसी विषय पर गहराई में चर्चा करेंगे।

भारत और अमेरिका के बीच एक बड़ा व्यापार समझौता होने की संभावना है। इस समझौते को लेकर जितनी उम्मीदें हैं, उससे कहीं ज़्यादा चिंताएं हैं। और इन चिंताओं का केंद्र है—जेनेटिकली मॉडिफाइड यानी GM फूड और बीज। यानि वो फसलें और अनाज जिन्हें वैज्ञानिक तरीके से बदला गया है, ताकि वो तेज़ी से उगें, कीटों से लड़ें, या अधिक उत्पादन दें। पहली नज़र में यह एक प्रगति की कहानी लगती है। लेकिन जब इसके पीछे की हकीकत समझ में आती है, तो ये ‘प्रगति’ धीरे-धीरे ‘निर्भरता’ का ज़हर बन जाती है।

पूर्व रॉ प्रमुख विक्रम सूद ने इस मामले में बेहद गंभीर चेतावनी दी है। वो कोई राजनेता नहीं, कोई व्यापारी नहीं, बल्कि वो शख्स हैं जिन्होंने दशकों तक भारत की खुफिया नीति की कमान संभाली। उन्होंने साफ कहा है कि अमेरिका की व्यापारिक लॉलीपॉप एक जाल है—जिसमें भारत की कृषि, उपभोक्ता और संप्रभुता फंस सकती है। और सबसे बड़ा खतरा है—इन GM बीजों की वह आदत, जो एक बार लग गई, तो छुड़ाना नामुमकिन है। ये बीज खुद नहीं उगते। यानि हर साल किसान को नया बीज खरीदना होगा, वो भी उन्हीं अमेरिकी कंपनियों से, जिनसे यह डील की जा रही है।

20 साल पहले भी विक्रम सूद ने ऐसे ही एक खतरे को पहचाना था। उन्होंने बताया कि इन GM बीजों की विशेषता यह है कि ये “टर्मिनेटर सीड्स” होते हैं—जो अगली फसल के लिए बीज नहीं दे सकते। मतलब किसान अपनी जमीन का मालिक होकर भी उसमें पराया बीज बोएगा, पराई शर्तों पर। यह एक ऐसी परतंत्रता है जो हथियारों या सेनाओं से नहीं, बल्कि खेत की मिट्टी और किसान के पसीने के ज़रिए लागू की जाएगी। क्या भारत, जिसने हरित क्रांति में आत्मनिर्भरता हासिल की, अब फिर से किसी विदेशी कंपनी का ‘एग्री-सर्वेंट’ बन जाएगा?

सूद की चेतावनी केवल भावनात्मक नहीं है, बल्कि वैज्ञानिक आधार पर है। उन्होंने फ्रांसीसी रिसर्चर नाथन बटालियन का हवाला दिया, जिन्होंने GM फसलों से जुड़ी 50 से ज़्यादा हानिकारक बातों की सूची तैयार की है। इसमें पर्यावरणीय असंतुलन, मानव स्वास्थ्य पर असर, और जैव विविधता के नुकसान से लेकर दीर्घकालिक खाद्य संकट तक की आशंका जताई गई है। सोचिए, जिस देश में हर तीसरे घर का पेट सीधे खेत से आता है, वहां अगर बीज और खाद्य सुरक्षा का नियंत्रण विदेशी कंपनियों के हाथ में चला जाए—तो क्या वो आज़ादी बची रहेगी, जिस पर हमें गर्व है?

दरअसल, अमेरिका की नीति हमेशा से रही है—“America First”। चाहे राष्ट्रपति ट्रंप हों या कोई और, अमेरिकी कंपनियों के हित सबसे ऊपर रखे जाते हैं। लॉकीड मार्टिन, माइक्रोसॉफ्ट, मोनसेंटो, एक्सॉनमोबिल—इनकी पहुंच अब सिर्फ टेक्नोलॉजी और रक्षा तक नहीं रही, बल्कि अब ये हमारे खेतों तक पहुंच बनाना चाहती हैं। और यह सब व्यापार के नाम पर, दोस्ती के नाम पर, और ‘विकास’ की मिठास के साथ। लेकिन भारत को समझना होगा कि ये मिठास लॉलीपॉप की तरह है—ऊपरी तौर पर मीठी, लेकिन भीतर से खोखली और खतरनाक।

जीटीआरआई यानी ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव ने भी सरकार को चेताया है कि, GM बीजों और खाद्य पदार्थों की मंज़ूरी भारत के कृषि Export को बर्बाद कर सकती है। खासकर यूरोप जैसे बाज़ार, जो ‘GMO Free’ प्रमाणित उत्पाद ही लेते हैं, वे भारत से Import बंद कर सकते हैं। यानि एक तरफ हम विदेशी कंपनियों की लॉबी से बीज खरीदेंगे, और दूसरी तरफ हमारे अपने किसान का Export बंद हो जाएगा। यह दोहरी मार है—आर्थिक भी और आत्मनिर्भरता पर भी।

इस पूरे खेल का सबसे भयावह हिस्सा है—किसान की मजबूरी। आज भारत के करोड़ों किसान मानसून, मंडी और महंगाई से लड़ रहे हैं। लेकिन कल उन्हें एक और युद्ध लड़ना होगा—बीज कंपनियों के साथ। और ये युद्ध वो हथियारों से नहीं, कर्ज और निर्भरता के जाल में उलझकर हारेंगे। एक किसान जो कभी अपने दादाजी के बीजों से खेत भरता था, अब विदेशी कंपनी के बीज के बिना एक पौधा भी नहीं उगा सकेगा। सोचिए, वो किसान तब क्या होगा, जब बीज का दाम उसकी फसल से ज़्यादा हो जाएगा?

भारत सरकार इस मुद्दे पर गंभीरता से सोच रही है। लेकिन अमेरिका दबाव बना रहा है। वो चाहता है कि भारत ‘छोटे-मोटे व्यापारिक फायदे’ के बदले इन GM उत्पादों को मंज़ूरी दे दे। जैसे—सेब, नट्स, बादाम, रक्षा उपकरण, या कच्चा तेल। लेकिन सवाल यह है—क्या ये ‘फायदे’ इतने बड़े हैं कि हम अपने किसानों की आत्मनिर्भरता और देश की खाद्य सुरक्षा को दांव पर लगा दें?

यह व्यापारिक लॉलीपॉप अगर एक बार भारत ने चख ली, तो इससे बाहर निकलना नामुमकिन होगा। और तब हमारी स्थिति वैसी ही होगी, जैसी कभी ईस्ट इंडिया कंपनी के दौर में थी—जहां व्यापार के बहाने राज चलता था, और स्थानीय लोग सिर्फ ‘उपभोक्ता’ बनकर रह गए थे। आज फर्क बस इतना है कि झंडा अलग है, लेकिन मंशा वही पुरानी।

भारत को यह स्पष्ट करना होगा कि हमारी प्राथमिकताएं अलग हैं। हमारी ज़रूरतें अलग हैं। अमेरिका से मतभेद होने का मतलब यह नहीं कि हम अमेरिका-विरोधी हैं। बल्कि इसका मतलब है कि हम भारत-पक्षधर हैं। हम अपने किसानों, अपने खेतों, और अपने भविष्य को किसी भी बहुराष्ट्रीय कंपनी की दया पर नहीं छोड़ सकते।

अभी समय है। भारत को GM खाद्य पदार्थों और बीजों पर अपनी दृढ़ता दिखानी होगी। कोई भी डील, चाहे वह कितनी भी लाभकारी दिखे, अगर वह हमारी कृषि को गुलामी की ओर ले जाती है, तो उसे ठुकरा देना ही बुद्धिमानी है। यह केवल किसानों की नहीं, बल्कि हर नागरिक की लड़ाई है—क्योंकि भोजन हर किसी का हक है, और उस भोजन की स्वतंत्रता भी।

भारत को अपनी ‘GMO Free’ छवि बचानी होगी। खासकर यूरोप, ऑस्ट्रेलिया जैसे बाज़ारों में, जहां भारत का जैविक उत्पाद बेहद मांग में है। अगर हमने जल्दबाज़ी में अमेरिका की मांगें मान लीं, तो न केवल हमारे Export घटेंगे, बल्कि हमारा वैश्विक सम्मान भी खतरे में पड़ जाएगा।

इसलिए यह ज़रूरी है कि भारत लॉलीपॉप की चमक से प्रभावित न हो, बल्कि उस लॉलीपॉप के भीतर छिपे ज़हर को देखे। व्यापार तब तक लाभदायक है, जब तक वह आत्मसम्मान को न छीन ले। और अमेरिका जैसी महाशक्ति से डील करते समय, यह बात सबसे पहले ध्यान में रखनी होगी।

क्योंकि यह डील केवल व्यापार नहीं है, यह एक रणनीतिक युद्ध है—जहां अमेरिका की सेना बंदूक लेकर नहीं, बल्कि बीज लेकर आती है। और अगर हमने सही समय पर सही निर्णय नहीं लिया, तो अगली पीढ़ी हमें यही पूछेगी—“जब खेतों की आज़ादी छिन रही थी, तब आप चुप क्यों थे?”

अब फैसला हमारे हाथ में है। अमेरिका की लॉलीपॉप डील को एक कड़वा सच मानें, या मीठी चाल में फंसकर खुद को गुलाम बनाएं। इस बार गुलामी ताज नहीं लेगी, बल्कि खेत, बीज, और रोटी—हमसे हमारी ज़मीन और ज़मीर छीन लेगी। क्या हम तैयार हैं?

Conclusion

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