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Economic Survey दिखाता है भारत की मजबूती – बजट से पहले वो रिपोर्ट, जो सच दिखा देती है! 2026

Economic Survey

बजट से ठीक एक दिन पहले संसद में एक मोटी-सी रिपोर्ट रखी जाती है। कैमरे चल रहे होते हैं, अख़बारों की हेडलाइन तय हो रही होती है, शेयर बाज़ार में हलचल शुरू हो जाती है। लेकिन आम आदमी के मन में एक डर और जिज्ञासा साथ-साथ चलती है—“अगर इस रिपोर्ट में हालात खराब निकले, तो कल बजट में क्या होगा?” यही वो पल होता है, जहां एक डॉक्यूमेंट पूरे देश की उम्मीदें और आशंकाएं अपने भीतर समेटे खड़ा होता है। इस रिपोर्ट का नाम है—आर्थिक सर्वे, यानी Economic Survey of India। बजट से पहले ये क्यों आता है, इसमें ऐसा क्या लिखा होता है कि सरकार, संसद, Investor और आम लोग—सब इसकी तरफ टकटकी लगाए देखते हैं?

Economic Survey को अगर आसान भाषा में समझें, तो ये सरकार की तरफ से देश की अर्थव्यवस्था का आईना होता है। जैसे घर में साल के अंत में बैठकर हम हिसाब लगाते हैं—कमाई कितनी हुई, खर्च कितना बढ़ा, कर्ज उतरा या और चढ़ गया—ठीक वैसे ही देश के स्तर पर ये रिपोर्ट बताती है कि बीते एक साल में भारत की आर्थिक सेहत कैसी रही। फर्क बस इतना है कि यहां आंकड़े लाख-करोड़ में होते हैं और असर 140 करोड़ लोगों की जिंदगी पर पड़ता है।

हर साल जब वित्त मंत्री बजट पेश करने से पहले Economic Survey संसद में रखते हैं, तो असल में वो ये संकेत दे रहे होते हैं—“कल जो फैसले होंगे, वो हवा में नहीं होंगे, बल्कि इसी रिपोर्ट में दर्ज हकीकत पर आधारित होंगे।” यही वजह है कि आर्थिक सर्वे को बजट की backbone कहा जाता है। बिना इसे समझे बजट को समझना अधूरा रह जाता है।

इस रिपोर्ट में सबसे पहले बात होती है growth की। यानी देश की GDP कितनी बढ़ी, रफ्तार तेज रही या धीमी। अगर growth मजबूत दिखती है, तो सरकार के पास खर्च बढ़ाने की थोड़ी आज़ादी होती है। लेकिन अगर growth कमजोर हो, तो बजट में caution दिखता है। यहीं से डर और उम्मीद का खेल शुरू होता है। Investor यही देखकर अंदाजा लगाते हैं कि आने वाले साल में economy expansion mode में रहेगी या survival mode में।

Economic Survey सिर्फ growth की तारीफ या आलोचना नहीं करता, बल्कि ये बताता है कि ये growth आई कहां से। खेती ने कितना साथ दिया, उद्योग का पहिया कितना चला, services sector ने कितनी ताकत दिखाई। भारत जैसे देश में जहां करोड़ों लोगों की रोज़ी-रोटी खेती से जुड़ी है, वहां सर्वे में agriculture पर खास नज़र होती है। मानसून कैसा रहा, फसल उत्पादन बढ़ा या घटा, किसानों की आय पर दबाव है या नहीं—ये सब इसी रिपोर्ट से सामने आता है।

इसके बाद बात आती है महंगाई की। Inflation वो शब्द है, जिसे सुनते ही आम आदमी की जेब सिहर जाती है। दूध, सब्ज़ी, गैस सिलेंडर, पेट्रोल—सबका हाल आर्थिक सर्वे में दर्ज होता है। अगर महंगाई काबू में दिखती है, तो सरकार राहत की सांस लेती है। लेकिन अगर आंकड़े डराने वाले हों, तो बजट में टैक्स कटौती या सब्सिडी जैसे कदमों की गुंजाइश तलाशनी पड़ती है।

रोजगार—ये शायद सबसे संवेदनशील मुद्दा है। Economic Survey इस बात की भी तस्वीर पेश करता है कि रोजगार के मौके बढ़े या नहीं, formal jobs कितनी बनीं, informal sector का क्या हाल रहा। Startup ecosystem, manufacturing push, PLI schemes—इन सबका असर भी यहीं आकर जुड़ता है। सरकार अक्सर अपने reforms का असर इसी रिपोर्ट के जरिए दिखाने की कोशिश करती है।

बहुत से लोग पूछते हैं—आर्थिक सर्वे आखिर लिखता कौन है? ये कोई राजनीतिक भाषण नहीं होता। इसे तैयार करने की जिम्मेदारी होती है वित्त मंत्रालय के मुख्य आर्थिक सलाहकार, यानी Chief Economic Advisor और उनकी टीम की। इसमें economists, statisticians और policy experts शामिल होते हैं। ये लोग साल भर डेटा इकट्ठा करते हैं—RBI, World Bank, IMF, NSSO, अलग-अलग ministries से। इसलिए ये रिपोर्ट सिर्फ सरकार का नजरिया नहीं, बल्कि आंकड़ों के आधार पर बनाई गई एक comprehensive तस्वीर होती है।

यही वजह है कि कई बार Economic Survey सरकार को भी uncomfortable सच दिखा देता है। अगर कहीं policy failure हुआ हो, या किसी sector में सुधार की रफ्तार धीमी हो, तो वो बात भी इसमें दर्ज होती है। यही इसकी credibility है। International investors भी इसी रिपोर्ट को पढ़कर समझते हैं कि भारत खुद अपनी economy को लेकर कितना honest है।

अब सवाल आता है—इसे बजट से पहले ही क्यों पेश किया जाता है? सोचिए, अगर बजट पहले आ जाए और बाद में आर्थिक सर्वे आए, तो क्या होगा? तब सर्वे, बजट का बचाव करने वाला डॉक्यूमेंट बन जाएगा। लेकिन जब सर्वे पहले आता है, तो वो एक neutral ground तैयार करता है। संसद और जनता को पहले ही पता चल जाता है कि economy की असली हालत क्या है। फिर बजट पर बहस होती है—क्या सरकार ने इन चुनौतियों का सही जवाब दिया या नहीं।

Economic Survey को अक्सर economy का report card कहा जाता है। लेकिन ये सिर्फ नंबरों का खेल नहीं है। इसमें future outlook भी होता है। यानी आगे के साल में economy को किन खतरों का सामना करना पड़ सकता है—global slowdown, geopolitical tensions, oil prices, climate change—ये सब risks भी इसमें discuss किए जाते हैं। साथ ही opportunities भी बताई जाती हैं—manufacturing shift, digital economy, green energy।

पिछले कुछ सालों में economic survey ने कई दिलचस्प concepts popular किए हैं। कभी “Animal Spirits” की बात हुई, कभी “V-shaped recovery”, कभी “Atmanirbhar Bharat” की economic logic समझाई गई। ये concepts बाद में policy debates का हिस्सा बन जाते हैं। यानी सर्वे सिर्फ रिपोर्ट नहीं, narrative भी सेट करता है।

आम आदमी के लिए आर्थिक सर्वे क्यों जरूरी है? क्योंकि यही रिपोर्ट बताती है कि सरकार किन समस्याओं को मान रही है। अगर सर्वे में साफ लिखा है कि बेरोजगारी चुनौती है, तो बजट में रोजगार पर सवाल उठाना जायज़ हो जाता है। अगर महंगाई को लेकर चिंता जताई गई है, तो जनता समझ पाती है कि सरकार इस दर्द से अनजान नहीं है।

Investors के लिए ये रिपोर्ट एक roadmap होती है। कौन से sector में growth potential है, कौन से sector में policy support मिलेगा—ये संकेत यहीं से मिलते हैं। Stock market में कई बार economic survey के दिन ही movements दिखने लगते हैं, क्योंकि बड़े खिलाड़ी future की positioning यहीं से शुरू कर देते हैं।

इतिहास में जाएं तो भारत में Economic Survey की परंपरा आज़ादी के बाद से चली आ रही है। पहले इसे बजट का हिस्सा माना जाता था, लेकिन 1960 के आसपास इसे अलग दस्तावेज के रूप में पेश करने की परंपरा शुरू हुई। मकसद साफ था—analysis को announcement से अलग रखना। यही separation of analysis and policy भारत की fiscal maturity को दिखाता है।

आज global world में जब India खुद को fastest growing major economy कहता है, तो उसकी credibility economic survey जैसे documents से ही बनती है। IMF, World Bank, rating agencies—सब इसी तरह की official assessments पर भरोसा करते हैं।

लेकिन एक बात साफ है—economic survey कोई जादुई किताब नहीं है, जो सारे जवाब दे दे। ये दिशा दिखाता है, रास्ता नहीं। रास्ता तय करना बजट और policies का काम है। और यहीं लोकतंत्र का असली टेस्ट होता है—क्या सरकार survey में बताए गए सच का सामना करती है, या उसे नजरअंदाज कर देती है।

इसलिए जब अगली बार बजट से एक दिन पहले टीवी पर economic survey की खबर चले, तो उसे boring सरकारी रिपोर्ट समझकर ignore मत कीजिए। उसी में छिपा होता है कल के बजट का संकेत, आने वाले साल की economy की कहानी, और आपकी जेब से जुड़े फैसलों की नींव।

क्योंकि बजट एक दिन का event होता है, लेकिन आर्थिक सर्वे एक साल की सच्चाई। और लोकतंत्र में सच्चाई जितनी पहले सामने आ जाए, फैसले उतने ही मजबूत होते हैं। यही वजह है कि बजट से पहले आर्थिक सर्वे सिर्फ जरूरी नहीं, बल्कि अनिवार्य है।

Conclusion

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