सोचिए… एक सर्द शाम हो और लंदन की गलियों में हल्की धुंध फैली हो। एक पुरानी इमारत के लकड़ी के दरवाज़े पर सुनहरी पट्टिका लगी हो— “The East India Company”. यही वो नाम है जिसने एक समय पूरी दुनिया को बदल दिया था, जिसने भारत के इतिहास को मोड़ दिया, जिसने 200 साल तक इस देश पर राज किया, और जिसके आगे भारतीय राजा, नवाब, सामंत—सबके-के-सब घुटने टेकते थे।
कल्पना कीजिए… कि इसी दरवाज़े को एक दिन एक भारतीय खटखटाता है। और दरवाज़ा खुलते ही पता चलता है कि अब इस कंपनी का मालिक कोई अंग्रेज नहीं… बल्कि वही भारतीय है जिसके देश पर कभी इसी कंपनी ने जुल्म ढाए थे। यह दृश्य सिर्फ ऐतिहासिक नहीं, भावनात्मक भी है—जैसे इतिहास को पलटकर फिर से लिखा जा रहा हो। यही कहानी है संजीव मेहता की, और यही वह सच है जिसने दुनिया को चौंका दिया—400 साल बाद East India Company के मालिक एक भारतीय हैं।
कहानी की शुरुआत 1600 में लंदन से होती है। इंग्लैंड की Queen Elizabeth I एक दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर करती हैं—एक charter जो दुनिया के सबसे बड़े corporate empire की नींव रखता है: The East India Company। उस समय किसी को अंदाज़ा नहीं था कि यह कंपनी सिर्फ व्यापार नहीं करेगी, बल्कि एक दिन पूरा देश—भारत—इसके कब्ज़े में आ जाएगा। 24 अगस्त 1608, विलियम हॉकिन्स भारत पहुँचता है। एक अंग्रेजी जहाज़ सूरत के तट पर खड़ा होता है।
यह एक साधारण दिन नहीं था—यह वह दिन था जब अंग्रेजों ने भारत में कदम रखा। लेकिन भारत ने उन्हें बुलाया नहीं था—वे आए थे here for business, मसाले, चाय, रेशम, नीला, अफीम—यूरोप के लिए इंडिया एक सोने की खदान था। सर्द देशों में मांस को सुरक्षित रखने के लिए मसालों की भारी मांग थी। भारत के मसाले यूरोप तक जाने लगे—और उनका मुनाफा East India Company के हाथों में।
फिर आया साल 1613, जब जहांगीर ने अंग्रेजों को सूरत में कारखाना लगाने की इजाज़त दे दी। भारत ने उस समय सोचा—अच्छा है, व्यापार बढ़ेगा, पैसे आएँगे। लेकिन इसी व्यापार की आड़ में कंपनी अपने पैर जमा रही थी। 1690 तक कंपनी कलकत्ता पहुँच गई—भारत में उनकी जड़ें अब गहरी होने लगी थीं। और फिर शुरू हुआ वह खेल… राजनीति का, फूट का, सत्ता का।
अंग्रेज समझ चुके थे कि भारत एक विशाल देश है, लेकिन इसके राजाओं के बीच एकता नहीं। बस यही कमजोरी उन्हें power में ले आई। Divide and rule—राजाओं को एक-दूसरे के खिलाफ भड़काना, छोटे झगड़ों को बड़े युद्ध में बदलना, और धीरे-धीरे सत्ता पर कब्ज़ा करना। यह सब इतना चुपचाप हुआ कि भारत को पता ही नहीं चला कि एक व्यापारिक कंपनी कब एक राजनीतिक शक्ति बन गई।
एक ऐसा समय आया जब भारतीय अपने ही देश में अंग्रेजों से इजाज़त लेकर जीने लगे। East India Company का दायरा इतना बड़ा था कि दुनिया में इसे “a company with its own army” कहा जाता था। उनके पास अपनी फौज, अपने जहाज़, अपने कानून, अपना currency तक था।
ब्रिटिश साम्राज्य के बारे में कहा जाने लगा—“the sun never sets on the British Empire” लेकिन इतिहास हमेशा एक जैसा नहीं रहता। जो ऊपर चढ़ता है, कभी न कभी नीचे भी आता है। और यह गिरावट शुरू हुई 1857 से—भारत की पहली स्वतंत्रता की लड़ाई। मेरठ की छावनी में सिपाहियों ने विद्रोह किया—और यह आग पूरे देश में फैल गई। क्रांति की चिंगारी ने East India Company को हिला दिया।
भारत की जनता, क्रांतिकारी, सैनिक—सबने मिलकर कंपनी को इतना कमजोर कर दिया कि उसका बिजनेस चलना मुश्किल हो गया। मसाले का व्यापार टूट गया, power structure बिखर गया, और आखिरकार 1874 में कंपनी को बंद करना पड़ा। करीब 200 साल तक भारत पर राज करने वाली कंपनी एक दिन कागज़ पर खत्म हो गई। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। कंपनी बंद थी… पर उसका नाम, उसका इतिहास, उसकी legacy—सब कुछ दुनिया के एक dark chapter की तरह बचा रहा। और फिर 131 साल बाद… एक भारतीय ने वह काम कर दिया जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी।
साल—2005। लंदन में दुनिया की सबसे कुख्यात और सबसे शक्तिशाली कंपनी का नाम फिर से revive करने की बात चल रही थी। शेयरहोल्डर्स इसे एक luxury brand बनाना चाहते थे। और तभी उस कमरे में एक भारतीय businessman नजर आता है—संज़ीव मेहता। वही संजीव मेहता, जिन्होंने कभी नहीं सोचा था कि वे दुनिया की सबसे पुरानी corporate power को खरीदने जा रहे हैं। लेकिन destiny की अपनी योजना होती है।
चलते-फिरते, सिर्फ 20 मिनट में, संजीव मेहता ने East India Company के 21% शेयर खरीद लिए। हाँ—20 मिनट। एक भारतीय को 400 साल पुरानी East India Company खरीदने की शुरुआत करने में सिर्फ 20 मिनट लगे—और अंग्रेजों को भारत पर राज करने में 200 साल।
यह सिर्फ एक खरीद नहीं थी—यह history की सबसे poetic justice moments में से एक था। वही कंपनी जिसने भारत को आर्थिक रूप से लूटा… वही कंपनी जिसने भारत की संस्कृति, व्यापार, शक्ति को बाँट दिया… वही कंपनी जिसके कारण भारत गुलाम बना… आज उसकी ownership एक भारतीय के हाथ में थी। यह symbolic revenge नहीं था—यह इतिहास को पलट देने जैसा था।
लेकिन संजीव मेहता कौन हैं? उनकी कहानी भी उतनी ही दिलचस्प है जितनी East India Company की। उनका जन्म 1961 में मुंबई के एक गुजराती जैन परिवार में हुआ। उनके दादा बेल्जियम में हीरे का कारोबार करते थे, यानी business उनकी DNA में था। परिवार फिर भारत आ गया, और व्यापार का माहौल बना रहा। संजीव पढ़ाई में sharp थे—Sydenham College, फिर IIM-Ahmedabad, फिर लॉस एंजेलिस का Gemological Institute। लेकिन सिर्फ पढ़ाई नहीं—उनमें risk-taking की आग थी। 1980 के दशक में उन्होंने export business शुरू किया—और पहली बड़ी सफलता उन्हें एक साधारण-सी hot water bottle “Huggy” से मिली। यहीं से वह समझ गए कि brand बनाना ही असली शक्ति है।
2005 में जब East India Company के नाम के revival की बात चली, संजीव मेहता ने रिसर्च शुरू कर दी। महीनों British Library और Victoria & Albert Museum में बैठकर उन्होंने कंपनी के इतिहास को understand किया। और जब मौका मिला—उन्होंने बिना समय गंवाए बदला हुआ इतिहास लिख दिया।
2010 तक वह कंपनी का पूरा ownership control ले चुके थे। कंपनी अब चाय, कॉफी, luxury products, royal gifting, spices, collectibles—इन सबका premium brand बन चुकी थी। लेकिन संजीव मेहता कहते हैं— “मैं मालिक नहीं हूँ, मैं इस legacy का custodian हूँ। ब्रांड इतिहास ने बनाया है, मैं सिर्फ इसे आगे ले जा रहा हूँ” और यही वह विनम्रता है जो इस कहानी को और भी खूबसूरत बनाती है।
सोचिए… जिस कंपनी ने भारत को गुलाम बनाया, आज वही एक भारतीय चला रहा है। यह सिर्फ एक business deal नहीं—यह एक national emotion है। यह वह क्षण है जब इतिहास और वर्तमान एक-दूसरे को देख कर मुस्कुराते हैं। यह वह पल है जब हम समझते हैं कि समय कितना बदल गया है—और कैसे destiny एक पूरी civilization की कहानी को उलटकर वापस मूल जगह पर खड़ा कर देती है।
आज East India Company एक luxury lifestyle brand है। उसके products दुनिया भर में बेचे जाते हैं। लेकिन यह व्यापार सिर्फ मुनाफे का नहीं—यह एक symbolic victory का व्यापार है। यह बताता है कि भारत की नई पीढ़ी सिर्फ global market में हिस्सा नहीं ले रही—बल्कि global legacy को own कर रही है।
जब अंग्रेज भारत आए थे, तो उनका मकसद था व्यापार और control। लेकिन आज एक भारतीय उसी कंपनी के steering wheel पर बैठा है—शालीनता से, समझदारी से, और गर्व से। यह कहानी हर भारतीय के लिए गर्व की कहानी है—क्योंकि इतिहास को हर दिन पलटा नहीं जा सकता। पर कभी-कभी एक व्यक्ति, एक फैसला, और 20 मिनट—इतना काफी होता है इतिहास को rewrite करने के लिए।
Conclusion
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