सोचिए… एक छोटा सा घर… मिट्टी का फर्श… दीवारों पर बचपन की खामोश हंसी… और उन दो छोटे कमरों के भीतर इतना बड़ा सपना, जितना उस घर की छत भी अपने अंदर समेट नहीं सकती। सोचिए उस लड़के के बारे में, जो रात को सोते समय छत की तरफ देखता था और सोचता था कि “क्या मेरी जिंदगी सिर्फ इन दो कमरों तक सीमित है?
क्या मेरी कहानी यहीं खत्म होनी चाहिए? या ये बस शुरुआत है?” बाहर दुनिया बड़ी थी, लेकिन उसके पास पैसा नहीं था… उसके पास privilege नहीं था… उसके पास बस एक चीज थी—जिद। जिद गरीबी को हराने की… जिद अपना future खुद लिखने की… और जिद ये साबित करने की कि दुनिया में बड़ी पहाड़ियाँ उन्हीं के लिए झुकती हैं, जिनमें चढ़ने का हौसला होता है। उस लड़के का नाम था—Dhirubhai Ambani।
28 दिसंबर 1932। Gujarat के सौराष्ट्र का छोटा सा गांव Chorwad। यही वो जगह थी जहां एक बेहद साधारण परिवार में जन्म हुआ उस बच्चे का, जिसने India की economic history को redefine कर देना था। उनके पिता हीराचंद अंबानी स्कूल मास्टर थे। ईमानदार थे… सख्त थे… लेकिन उनकी आमदनी उतनी नहीं थी कि family की हर जरूरत आसानी से पूरी हो सके।
दो कमरों का घर, सीमित साधन और बड़ा परिवार—यहीं से शुरू होती है Dhirubhai की असली जिंदगी। उस घर में पैसे की कमी थी, लेकिन character की नहीं। उस घर में luxuries नहीं थीं, लेकिन values थीं। और उसी घर में धीरूभाई ने एक बात बहुत कम उम्र में महसूस कर ली—गरीबी सिर्फ सुविधा नहीं छीनती, आत्मसम्मान भी छीन लेती है। यही एहसास उनके अंदर आग बनकर जल उठा।
स्कूल के दिनों में भी वो साधारण बच्चों जैसे नहीं थे। जूनागढ़ के बहादुर कंजी हाई स्कूल में पढ़ते हुए वो सिर्फ पढ़ाई नहीं करते थे… वो दुनिया समझ रहे थे… system समझ रहे थे। आजादी का दौर था… राजनीति दिलों को छू रही थी… और Dhirubhai भी इससे अछूते नहीं रहे। जूनागढ़ विद्यार्थी संघ के secretary बने। यहीं से उन्होंने पहली बार power, system, law और loopholes को practically समझना शुरू किया। एक बार एक political speech program पर पुलिस ने रोक लगा दी।
नियम कहा—स्पीच नहीं होगी। लेकिन दिमाग कहता था—मकसद रुकना नहीं चाहिए। धीरूभाई ने written assurance दिया कि वो खुद भाषण नहीं देंगे… और फिर किसी और से वही भाषण करवा दिया। Rule भी नहीं टूटा… और काम भी रुक नहीं पाया। ये incident छोटा था… लेकिन इसने आने वाले कल का blueprint दिखा दिया—rule को तोड़ना नहीं… rule के अंदर रास्ता निकालना।
1949। मैट्रिक के बाद घर की हालत ऐसी थी कि पढ़ाई जारी रखना luxury बन चुका था। यहां से कहानी dramatically बदलती है। जब दुनिया के बड़े बड़े बच्चे स्कूल के बाद भी family के सहारे होते हैं, तब 16 साल का ये लड़का घर भी छोड़ता है… और देश भी। वो निकल पड़ता है यमन के Aden की ओर। Aden तब दुनिया के सबसे बड़े trading hubs में से एक था। जहां दुनिया के बड़े deals होते थे… जहाज आते जाते थे… और पैसा circulate करता था। यही जगह Dhirubhai की असली “University of Life” बनी।
A Besse & Company में एक छोटी सी job मिली। लेकिन ये job उनके लिए सिर्फ नौकरी नहीं थी… ये training ground थी। वही गली, वही बाजार, वही सूक… जहां दुनिया के बड़े व्यापारी खेलने आते थे। यहीं धीरूभाई ने पहली बार global market की धड़कन feel की। उन्होंने देखा कि पैसा कैसे सोच से बनता है। Risk कैसे लिया जाता है। Timing कैसे game बदलती है। और Information कितने पैसे की होती है। Aden ने उन्हें discipline सिखाया। Accounting सिखाया। Foreign trade language सिखाई। लेकिन सबसे बड़ी चीज सिखाई—सोचना बड़ा और दौड़ना लंबा।
फिर आया वो किस्सा, जिसने उनकी सोच और दुनिया दोनों को हिला कर रख दिया। Aden में उन्होंने देखा कि Yemen में circulating currency “Rial” चांदी की बनी है। और उसकी चांदी की असली कीमत सरकार द्वारा fix की गई price से ज्यादा है। जब दुनिया उस coin को सिर्फ मुद्रा समझ रही थी, Dhirubhai ने उसमें opportunity देखी।
उन्होंने market से coins खरीदे… melt करवाए… और चांदी बेच दी। कुछ महीने तक ये काम चला… और फिर सरकार ने कानून बदल दिया। लेकिन तब तक वो लाखों कमा चुके थे। ये कोई shortcut नहीं था। ये चोरी नहीं थी। ये grey market trick नहीं थी। ये pure intelligence थी। Market reading थी। Risk understanding थी। Timing mastery थी। यही Dhirubhai की असली पहचान बनने वाली थी।
लेकिन Aden ने उन्हें सिर्फ पैसे कमाना नहीं सिखाया… उसने उन्हें सिखाया रोकना, इंतजार करना, strategy बनाना। उनके आसपास ऐसे लोग भी थे जो पैसे देखते ही उड़ा देते थे। लेकिन धीरूभाई सादा जीवन जीते रहे। खर्च कम रखा। Capital build की। और एक बात दिमाग में बिठा ली—“जल्दी अमीर बनने का लालच सबसे खतरनाक जाल है। लंबी दौड़ जीतनी है, तो patience सबसे बड़ा investment है।”
कुछ साल बाद उन्होंने वह फैसला लिया जिसने India का future बदल दिया। वो वापस भारत लौट आए। बहुत बड़ी capital लेकर नहीं, लेकिन बहुत बड़ी understanding लेकर। उन्होंने सोचा कि बड़े industry पर कूदने से पहले market सीखना जरूरी है। इसलिए उन्होंने शुरुआत की trading से। उन्होंने spices और yarn का import export शुरू किया।
उस दौर का भारत आसान नहीं था। License राज का दौर था। हर काम के लिए file… हर file के लिए department… हर department के लिए approval… और हर approval अपने आप में एक जिंदा सांप। जिस system से लोग डरते थे, धीरूभाई ने उसे study किया। लोग bureaucracy से टकराते थे… Dhirubhai उसके साथ walk करते थे।
उनकी सबसे बड़ी skill यही थी—rulebook पढ़ो… loophole समझो… और उसी rule के अंदर जीत का रास्ता बनाओ। वो कुर्सियों से डरते नहीं थे। वो लोगों से बात करते। trust बनाते। relationship build करते। और ये सब किसी manipulation के लिए नहीं, बल्कि dream build करने के लिए करते थे। उनके अंदर clarity थी। Vision था।
और सबसे महत्वपूर्ण—रुकने का कोई option नहीं था। Trading ने उन्हें तीन चीजें दीं—confidence, capital और courage। उन्होंने देखा कि भारत तेजी से बदल रहा है। Population बढ़ रही है। Middle class बढ़ रहा है। Demand बढ़ रही है। और इसी demand में उन्होंने देखा—India को कपड़े चाहिए… और future polyester का होने वाला है। यह वही thought था जिसने धीरे धीरे Reliance की foundation रखी।
India वापसी के बाद उनका formula simple था—छोटे कदम… साफ सोच… और बड़े destination की planning। उन्होंने कभी overnight miracle में विश्वास नहीं किया। उन्होंने foundation पर जोर दिया। एक एक ईंट मजबूती से रखी। और फिर वो दिन आया जब Reliance सिर्फ company नहीं रही… वो एक national revolution बन गई।
Reliance सिर्फ business empire नहीं बना। Reliance ने middle class को stock market से जोड़ दिया। Reliance ने retail investor को power दी। Reliance ने दिखाया कि India सिर्फ market नहीं, manufacturing powerhouse बन सकता है। उनका vision था—“सोचो कम मत, बड़ा सोचो। Walk मत करो… दौड़ो। और अगर दीवार सामने आए… उसे तोड़ो नहीं… उसके ऊपर चढ़ो।”
ये वही Dhirubhai थे जिन्होंने कहा था—“अगर लोग आप पर भरोसा करते हैं, तो असंभव भी संभव हो जाता है।” और लोगों ने भरोसा किया। Investors ने भरोसा किया। Employees ने भरोसा किया। और सबसे बड़ी बात—India ने भरोसा किया। लेकिन हर महान इंसान की तरह उनकी journey भी आसान नहीं रही। उन्हें criticize किया गया। उन पर सवाल उठे। उनके methods पर debates हुईं। लेकिन एक बात कभी नहीं बदली—उनकी determination। वो कहते थे—“Think big, think fast, think ahead. Ideas are nobody’s monopoly.” और उन्होंने ये practical करके दिखा दिया।
आज Reliance सिर्फ एक कंपनी नहीं… ये एक ecosystem है। एक legacy है। एक belief है कि अगर एक छोटे गांव का लड़का… दो कमरों के घर से निकलकर Empire बना सकता है… तो इस दुनिया में कोई भी चीज impossible नहीं। और फिर आया वो दिन… जिसने India को रुला दिया। 6 जुलाई 2002। Dhirubhai Ambani इस दुनिया को अलविदा कह गए। लेकिन वो सिर्फ इंसान नहीं थे… वो एक सोच बन चुके थे। एक inspiration। एक example। और legends मरते नहीं… वो stories बन जाते हैं। आज भी जब कोई youngster dream देखता है… जब कोई middle class लड़का रात को छत देख कर future imagine करता है… तब कहीं न कहीं Dhirubhai की कहानी उसके subconscious में जगती है।
Conclusion
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