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Shocking: Corruption पर खुला वार भारत के 10 विभागों की सच्चाई जानकर जाग उठेगा देश।

Corruption

आप सोचिए… आपने एक घर बनवाने की योजना बनाई। ज़मीन ली, नक्शा पास करवाने गए, तो ऑफिसर ने कहा—“काम हो जाएगा, लेकिन चाय-पानी का इंतज़ाम करना पड़ेगा।” आप चुपचाप हजारों रुपये पकड़ा देते हैं, क्योंकि आपको डर है—ना देने पर फाइल दबा दी जाएगी। लेकिन ये तो बस शुरुआत है। जब बिजली का कनेक्शन चाहिए, तब रिश्वत। जब पानी जोड़ना हो, तब रिश्वत।

जब सड़क बनवानी हो, तब भी। सवाल ये नहीं कि कहां रिश्वत मांगी जाती है—सवाल ये है कि भारत में ऐसा कौन-सा विभाग है जो रिश्वत के बिना काम करता है? और जब ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल, लोकपाल, मीडिया रिपोर्ट्स और जनता की आवाज़ एक साथ चीख-चीखकर एक ही बात कहें… तो ये आर्टिकल उसी सच्चाई को सामने लाने का जरिया बन जाता है। आज हम इसी विषय पर गहराई में चर्चा करेंगे।

हम बात कर रहे हैं देश के उन 10 विभागों की… जो भ्रष्टाचार के मामले में सबसे ऊपर हैं। यह सिर्फ आकड़ों की बात नहीं है—यह उन करोड़ों आम भारतीयों की कहानी है जो हर दिन सिस्टम से टकराते हैं। जिन्हें अपने हक़ के लिए भी घूस देनी पड़ती है। और सबसे ऊपर है—पुलिस विभाग। जहां न्याय बिकता है, और ज़ुल्म पैसे से दबा दिया जाता है।

पुलिस—जिसका काम है सुरक्षा देना, वही आज डर की वजह बन चुका है। कोई एफआईआर नहीं लिखता, जब तक जेब गर्म न की जाए। सड़क पर बाइक रोकी जाती है, कागज़ सही हों फिर भी “कुछ तो निकालिए साहब” की आवाज़ आती है। ज़मीन विवाद हो, झगड़ा हो या महिला सुरक्षा का मामला—पुलिस पहले रिश्वत मांगती है, फिर रिपोर्ट लिखती है। और अगर आप पैसा न दो, तो पीड़ित बन जाता है आरोपी। देश की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि जिसके पास अधिकार है, वही सबसे बड़ा अपराधी भी बन चुका है।

अब बात करें Department of Revenue की। यानी ज़मीन-जायदाद, रजिस्ट्री, खतौनी, नामांतरण… ये सब जिस सिस्टम के भरोसे चलना चाहिए, वहीं सबसे ज्यादा घपला होता है। कोई ज़मीन का मालिक है या नहीं, यह तय करने वाले दस्तावेज़ ही पैसे से बदले जा सकते हैं। “फाइल चलवानी है? तो बाबू से मिलिए, थोड़ा खर्चा होगा…” यह डायलॉग आपको हर तहसील में सुनाई देगा। जमीन बेचनी हो या खरीदनी—असली मालिक बाद में पता चलता है, पहले तो रिश्वत का नंबर आता है।

अब आते हैं नगर निगम/नगर पालिका की तरफ। क्या आप जानते हैं, कई शहरों में बिना नक्शा पास किए इमारतें बन जाती हैं? और अगर किसी इमारत में अवैध निर्माण है, तो अधिकारी आंखें मूंद लेते हैं—क्यों? क्योंकि जेब गर्म हो चुकी होती है। साफ-सफाई, कूड़ा उठाना, सीवर लाइन डालना, सड़क पर गड्ढे भरवाना—इनमें से कोई काम तब तक नहीं होता जब तक आप ‘फीस’ न चुकाएं। और ये फीस कोई सरकारी नहीं, बल्कि निजी होती है—जिसे हम आम भाषा में रिश्वत कहते हैं।

ग्रामीण इलाकों की बात करें, तो ग्राम पंचायत और ब्लॉक स्तर पर तो हाल और भी खराब है। सोचिए, सरकार गरीबों के लिए शौचालय योजना लाती है, वृद्धावस्था पेंशन देती है, विधवा पेंशन का प्रावधान है—लेकिन जिनके लिए यह सब है, उन्हें इसे पाने के लिए भी रिश्वत देनी पड़ती है। प्रधान, सचिव, या ग्राम सेवक—हर किसी की जेब में एक रेट लिस्ट होती है। “प्रधानमंत्री आवास योजना चाहिए? 15 हजार लगेगा।” और यही पैसा गरीबों के हक को लूटकर अफसरों के घरों में आलीशान कमरे बना देता है।

अब बात करें बिजली विभाग की। हर महीने आपको जो बिल आता है, उसमें असल खर्च से ज्यादा होता है—क्यों? क्योंकि मीटर रीडिंग में जानबूझकर गड़बड़ी की जाती है। और अगर आप कंप्लेन करें, तो लाइनमैन कहता है, “पैसे दीजिए, तभी फॉल्ट ठीक होगा।” कई जगह तो कनेक्शन के लिए महीनों चक्कर लगाने पड़ते हैं, जब तक जेब से मोटी रकम न निकले। क्या यही है ‘सर्विस डिलिवरी’? नहीं, ये एक खुला लूटतंत्र है, जहां बिजली सिर्फ उन तक पहुंचती है, जिनकी जेब में रिश्वत देने की ताकत है।

इसके बाद आता है वो विभाग, जिसे हम आरटीओ यानी सड़क परिवहन विभाग के नाम से जानते हैं। ड्राइविंग लाइसेंस चाहिए? कोई टेस्ट नहीं देना पड़ेगा, बस दलाल से मिलिए और पैसे दीजिए—सब काम हो जाएगा। पुराने वाहन फिटनेस टेस्ट में पास हो जाते हैं, नए वाहन बिना रजिस्ट्रेशन के दौड़ने लगते हैं। और यह सब उस तंत्र के कारण मुमकिन है, जहां नियमों को नोटों से हराया जाता है। यह वही जगह है, जहां रिश्वत देकर ट्रक वाले ओवरलोड चलाते हैं, और सड़कों पर हादसे आम बात बन जाते हैं।

अब थोड़ा ध्यान दें सरकारी अस्पतालों और स्वास्थ्य विभाग पर। एक तरफ सरकार मुफ्त इलाज का दावा करती है, दूसरी ओर अस्पतालों में डॉक्टर नदारद होते हैं। दवाइयों की सप्लाई कागज़ पर होती है, हकीकत में ब्लैक। मरीज को जानबूझकर निजी अस्पताल भेजा जाता है, जहां ऑपरेशन के नाम पर मोटी रकम वसूली जाती है। और सरकारी डॉक्टर को वहां से कमीशन मिलता है। कई बार अनावश्यक टेस्ट और दवाएं सिर्फ इसीलिए लिखी जाती हैं ताकि मेडिकल स्टोर से पैसा बना सकें। यह सिर्फ लूट नहीं, बल्कि इंसानियत के नाम पर सबसे बड़ा अपराध है।

अब चलिए शिक्षा विभाग की तरफ। शिक्षक भर्ती में घोटाले आम हो चुके हैं। कक्षा में शिक्षक मौजूद न हों, तब भी हाजिरी लगती है। सरकारी स्कूलों में किताबें और मिड-डे मील नहीं पहुंचते, क्योंकि रास्ते में ही पैसा खा लिया जाता है। निजी स्कूलों के साथ सांठगांठ करके सरकारी स्कूलों को जानबूझकर खराब हालत में छोड़ा जाता है, ताकि माता-पिता मजबूर हो जाएं महंगे स्कूलों में बच्चों को भेजने के लिए। यह शिक्षा नहीं, यह बच्चों का भविष्य बेचने का व्यापार है।

एक और विभाग जो लगातार आरोपों में रहता है, वो है आवास एवं शहरी विकास विभाग। शहरों का विकास ठेकेदारों और अफसरों की सेटिंग से चलता है। टेंडर की प्रक्रिया में पारदर्शिता सिर्फ कागज़ पर होती है। वही कंपनी ठेका पाती है जो “समझदारी” दिखाती है—यानि जेबें भरती है। गुणवत्ता की बात छोड़िए, कई बार सड़क बनने से पहले ही टूट जाती है। पर जब हर हिस्से में कमीशन बंटा हो, तो टिकाऊपन की उम्मीद कौन करे?

अंत में बात करें टैक्स विभाग की—चाहे इनकम टैक्स हो या जीएसटी। जिन व्यापारियों ने सालों मेहनत से बिजनेस खड़ा किया, उनके यहां छापे पड़ते हैं। लेकिन अगर वक्त पर ‘सेटिंग’ कर ली जाए, तो छापा कभी नहीं पड़ता। फर्जी रिटर्न पास हो जाते हैं, और जो रिश्वत नहीं दे पाते, उन्हें फंसाया जाता है। यहां भ्रष्टाचार सीधा देश की अर्थव्यवस्था पर चोट करता है, लेकिन अफसरों की जेब गर्म हो, तो आंकड़े सब ठीक लगते हैं।

इन 10 विभागों में जो सबसे डरावनी बात है, वो है बिचौलियों की भूमिका। अब रिश्वत सिर्फ ऑफिसर नहीं लेता, एक लंबी चेन बन चुकी है—जिसमें दलाल, स्थानीय नेता, और यहां तक कि कर्मचारी यूनियन के लोग भी शामिल होते हैं। एक छोटी सी फाइल खिसकवाने के लिए कई लोगों की जेब भरनी पड़ती है। और जितना बड़ा मामला, उतना बड़ा ‘कट’। इसी वजह से रिश्वत की रकम 2 से 5 गुना तक बढ़ जाती है। एक हिस्सा अधिकारी लेता है, बाक़ी बिचौलियों में बंट जाता है। और आम जनता, अपने हक के लिए भी गिड़गिड़ाती रह जाती है।

सवाल यह नहीं है कि हम भ्रष्टाचार से परेशान हैं—सवाल यह है कि हमने इसे स्वीकार कर लिया है। हमने मान लिया है कि बिना रिश्वत के काम नहीं होगा। यही कारण है कि भ्रष्टाचार अब नियम नहीं, व्यवस्था बन चुका है। और जब तक हम आवाज़ नहीं उठाएंगे, जब तक हम “न” कहना नहीं सीखेंगे—तब तक यह तंत्र ऐसे ही फलता-फूलता रहेगा।

आप सोचिए… अगर आपके जीवन के हर कदम पर आपको रिश्वत देनी पड़े—पढ़ाई के लिए, इलाज के लिए, नौकरी के लिए, ज़मीन के लिए, न्याय के लिए—तो आप लोकतंत्र में हैं या दलालतंत्र में? इस आर्टिकल को देखकर अगर आपको भी ऐसा लगा कि यह सच्चाई सामने लाना ज़रूरी था—तो इस आवाज़ को दूसरों तक पहुंचाइए। क्योंकि बदलाव तब होता है, जब सच्चाई शर्मिंदगी नहीं, गर्व बन जाए। और हां… अगली बार कोई आपसे रिश्वत मांगे, तो चुप मत रहिए—क्योंकि आपकी चुप्पी उस भ्रष्ट को ताकत देती है।

Conclusion

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