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Export: चीन ने 7 साल पहले ही समझ ली थी ट्रंप की चाल, टैरिफ के बावजूद Export में मचाया धमाल।

Export:

ज़रा सोचिए… जब दुनिया की सबसे ताकतवर अर्थव्यवस्था अमेरिका, किसी देश पर लगातार टैरिफ पर टैरिफ लगाती चली जाए, उसके सामान पर 50% से लेकर 145% तक Import duty बढ़ा दे, उसकी कंपनियों को वैश्विक स्तर पर दबाव में लाने की कोशिश करे, तब सामान्य तौर पर क्या होना चाहिए? उस देश की फैक्ट्रियाँ बंद हो जानी चाहिए, Export गिर जाना चाहिए, मज़दूर बेरोज़गार हो जाने चाहिए और पूरी अर्थव्यवस्था लड़खड़ा जानी चाहिए

। लेकिन अगर मैं कहूँ कि एक देश ऐसा भी है जिसने इन तमाम टैरिफ के बावजूद, न सिर्फ़ अपने Export को बरकरार रखा बल्कि और ज़्यादा ताक़तवर बनकर उभरा, तो? अगर मैं कहूँ कि उसने टैरिफ को अवसर में बदल दिया और अमेरिकी चाल को पहले ही पढ़ लिया, तो? जी हाँ, यह कहानी है चीन की—जिसने सात साल पहले ही डोनाल्ड ट्रंप की चाल समझ ली थी, और आज भी टैरिफ की मार झेलते हुए पूरी दुनिया के बाज़ारों में अपने सामान का जलवा कायम रखे हुए है। आज हम इसी विषय पर गहराई में चर्चा करेंगे।

डोनाल्ड ट्रंप, जो अपनी व्यापारिक नीतियों और “America First” एजेंडे के लिए जाने जाते हैं, उन्होंने अपने पहले कार्यकाल से ही चीन को सबक सिखाने की ठान ली थी। 2018 में जब उन्होंने अचानक चीनी सामान पर 25% और फिर 50% तक टैरिफ लगाने का एलान किया, तब दुनिया को लगा कि यह चीन की कमर तोड़ देगा।

बाद में यह आँकड़ा बढ़कर 145% तक पहुँच गया। लेकिन चीन ने इस हमले को पहले ही भांप लिया था। उसने अपनी रणनीति पहले ही बदलनी शुरू कर दी थी। चीन जानता था कि अमेरिका उसकी सबसे बड़ी मार्केट है और अगर उस पर ज़्यादा निर्भर रहा, तो किसी भी समय उसकी पूरी अर्थव्यवस्था खतरे में पड़ सकती है। इसलिए चीन ने अमेरिका पर निर्भरता कम करना शुरू कर दिया और नए बाज़ारों की ओर रुख किया।

यही वजह है कि जब अगस्त 2024 में अमेरिका को चीन के Export में 33% की गिरावट आई, तो चीन घबराया नहीं। उसने उसी समय यूरोपियन यूनियन, आसियान देशों और अफ्रीका की ओर अपना रुख कर लिया। आंकड़े बताते हैं कि यूरोपीय संघ को चीन का Export 10.4% बढ़ा, आसियान देशों को 22.5% और अफ्रीका को 26% की तेजी मिली। यानी जिस Export में अमेरिका ने कमी ला दी, उसकी भरपाई चीन ने दूसरे महाद्वीपों से कर ली। यह वही रणनीति थी जिसकी तैयारी उसने सात साल पहले ही शुरू कर दी थी।

आज स्थिति यह है कि अमेरिकी टैरिफ के बावजूद चीन दुनिया का ग्लोबल एक्सपोर्ट इंजन बना हुआ है। उसकी फैक्ट्रियाँ लगातार चल रही हैं और दुनिया के हर कोने में चीनी सामान पहुँच रहा है। 2023 में चीन का Export 3.58 ट्रिलियन डॉलर तक पहुँच गया और वह 1.2 ट्रिलियन डॉलर के रिकॉर्ड ट्रेड सरप्लस की ओर बढ़ रहा है। यानी जितना वह Import कर रहा है, उससे कहीं ज्यादा Export कर रहा है। यह किसी भी अर्थव्यवस्था के लिए बेहद मजबूत स्थिति है। साफ है कि अमेरिकी टैरिफ का असर चीन पर उतना नहीं हुआ जितना वॉशिंगटन ने सोचा था।

तो सवाल उठता है कि चीन ने यह उलटफेर कैसे किया? सबसे पहला कदम था—नए बाज़ारों की खोज और विविधता। चीन ने अमेरिका पर निर्भरता घटा दी। 2018 से अब तक अमेरिका का हिस्सा चीन के कुल Export में करीब 8% कम हो चुका है। यही 8% उसने आसियान, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका से पूरा कर लिया। उदाहरण के लिए, अफ्रीका में चीन ने बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) के ज़रिए अपने पैर पसार लिए।

चीन ने वहाँ सड़कों, बंदरगाहों और रेलवे में Investment किया। बदले में उसे न केवल अफ्रीकी प्राकृतिक संसाधनों तक पहुंच मिली बल्कि अपने उत्पादों के लिए तैयार बाज़ार भी। यही कारण है कि आज अफ्रीका के स्मार्टफोन बाज़ार में आधे से ज्यादा हिस्सेदारी चीनी कंपनियों की है। अफ्रीका में बिकने वाले कपड़ों का 40% चीन से आता है। और सौर पैनलों के मामले में तो चीन ने लगभग पूरे महाद्वीप पर कब्जा कर लिया है।

यानी चीन ने एक तीर से कई निशाने साधे। अफ्रीका और लैटिन अमेरिका जैसे देशों को उसने बुनियादी ढांचा बनाकर अपने साथ जोड़ लिया। इन देशों से वह खनिज और कृषि उत्पाद खरीदता है और बदले में अपने सस्ते सामान बेचता है। यही नहीं, इन व्यापारिक सौदों को वह डॉलर में नहीं बल्कि अपनी करेंसी युआन में करता है। इससे युआन को अंतर्राष्ट्रीय बनाने की उसकी महत्वाकांक्षा को भी बल मिला। आज कई अफ्रीकी देश और लैटिन अमेरिकी देश डॉलर छोड़कर युआन में व्यापार करने लगे हैं।

चीन की दूसरी बड़ी रणनीति रही—उत्पादन सुविधाओं को आसियान देशों में शिफ्ट करना। पहले उसने यह Investment इसलिए किया था ताकि उत्पादन लागत घट सके। लेकिन 2018 के बाद उसने इसे एक नए तरीके से इस्तेमाल किया। आसियान देशों के पास कई देशों के साथ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट है। चीन ने वहीं उत्पादन शुरू किया और फिर उन्हीं देशों से अमेरिका और यूरोप को सामान भेजा। यानी सीधे चीन से Export करने पर अगर टैरिफ लगता था, तो वह मलेशिया, वियतनाम या थाईलैंड से भेजकर उस टैरिफ से बच निकलता। इससे उसे डबल फायदा हुआ—एक तो अमेरिकी टैरिफ से बचाव, दूसरा आसियान देशों में रोजगार और Investment के नाम पर अपने रिश्ते मजबूत करना।

अगर हम चीन की स्थिति की तुलना भारत से करें, तो तस्वीर साफ़ हो जाती है। भारत की अमेरिका पर Export निर्भरता बहुत अधिक है। भारतीय दवा कंपनियाँ—खासतौर पर जेनेरिक दवाएँ बनाने वाली कंपनियाँ—अपना एक-तिहाई Export केवल अमेरिका को करती हैं। यह बाज़ार लगभग 10 अरब डॉलर का है। अब जब ट्रंप ने ब्रांडेड और पेटेंट वाली दवाओं पर 100% टैरिफ लगा दिया है, तो खतरा मंडरा रहा है कि भविष्य में जेनेरिक दवाओं पर भी यह बोझ आ सकता है। अगर ऐसा हुआ, तो भारतीय एक्सपोर्टर बुरी तरह प्रभावित होंगे। भारत पहले ही 50% टैरिफ की मार झेल रहा है।

यहीं पर भारत को चीन से सबक लेने की ज़रूरत है। चीन ने पहले ही समझ लिया था कि केवल अमेरिका पर निर्भर रहना खतरनाक हो सकता है। इसलिए उसने अपना नेटवर्क फैला दिया। भारत को भी यही करना होगा—अफ्रीका, लैटिन अमेरिका, आसियान और यूरोप में अपने लिए नए बाज़ार तलाशने होंगे। भारतीय दवा कंपनियाँ अगर अफ्रीका और एशिया के विकासशील देशों में अपनी पकड़ मजबूत करें, तो अमेरिकी टैरिफ का असर कम हो सकता है।

चीन की सफलता के पीछे एक और कारण है—उसका सप्लाई चेन पर कब्जा। रेयर अर्थ खनिजों से लेकर सौर पैनलों और इलेक्ट्रॉनिक्स तक, दुनिया का बड़ा हिस्सा चीन पर निर्भर है। अमेरिका भले ही टैरिफ लगाए, लेकिन उसके पास विकल्प कम हैं। यही वजह है कि चीन की पकड़ ढीली नहीं पड़ती।

चीन की कहानी हमें बताती है कि कैसे रणनीति, धैर्य और दूरदृष्टि से किसी भी आर्थिक युद्ध को मोड़ा जा सकता है। ट्रंप ने टैरिफ लगाकर सोचा था कि वे चीन की अर्थव्यवस्था को चोट पहुँचाएँगे, लेकिन चीन ने इसे अपने पक्ष में इस्तेमाल कर लिया। उसने नए बाज़ार बनाए, अपनी मुद्रा को मजबूत किया, अपने उत्पादन ठिकाने विविध बनाए और अफ्रीका-एशिया-लैटिन अमेरिका जैसे देशों में ऐसी जड़ें जमा दीं, जिन्हें उखाड़ना मुश्किल है।

आज स्थिति यह है कि चीन Global exports का लगभग 14.5% हिस्सा अपने पास रखता है। यह एक बेहद बड़ा आँकड़ा है। उसकी फैक्ट्रियाँ दिन-रात चल रही हैं, बंदरगाह माल से भरे हैं और दुनिया सस्ते चीनी सामान पर निर्भर है। अमेरिका के टैरिफ ने चीन की रफ्तार को धीमा ज़रूर किया, लेकिन रोक नहीं पाया। बल्कि इसने चीन को और मज़बूत बना दिया।

भारत को अब यह समझने की ज़रूरत है कि अगर उसे वैश्विक स्तर पर अपनी हिस्सेदारी बढ़ानी है, तो केवल पारंपरिक साझेदारों पर निर्भर नहीं रह सकता। उसे चीन की तरह अपनी रणनीति बनानी होगी। चाहे दवा उद्योग हो, टेक्नोलॉजी हो या मैन्युफैक्चरिंग—हर क्षेत्र में भारत को नए बाज़ारों की तलाश करनी होगी। तभी वह अमेरिकी टैरिफ की मार से बच सकेगा और अपनी अर्थव्यवस्था को सुरक्षित रख पाएगा।

यह कहानी सिर्फ़ चीन की आर्थिक जीत नहीं है, बल्कि यह दुनिया के लिए एक सबक है—कि वैश्विक व्यापार की दुनिया में जो आगे की सोच रखता है, वही टिकता है। और चीन ने यह साबित कर दिया है कि ट्रंप की चाल को सात साल पहले भांपकर तैयारी करना ही उसकी सबसे बड़ी जीत रही।

Conclusion

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