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Bollywood बदल रहा है! नए दौर की कहानियाँ और करोड़ों की कमाई ने फिल्म इंडस्ट्री को दी नई उड़ान। 2025

सुनसान सिनेमाघर… बंद पड़ी टिकट खिड़कियां… और बड़े-बड़े मल्टीप्लेक्स जहां कभी हर शुक्रवार को लंबी कतारें लगती थीं, वहां अब सन्नाटा पसरा है। कैमरों की चमक, सितारों की मुस्कान, डायरेक्टर का ऐक्शन और प्रोड्यूसर की उम्मीद—सब कुछ अब एक गहरी मायूसी में बदल गया है। एक दौर था जब एक फिल्म रिलीज होती थी और देश थम सा जाता था।

लेकिन अब हालात इतने बदल चुके हैं कि करोड़ों रुपए लगाकर फिल्म बनाने वाले प्रोड्यूसर सोच में डूबे हैं—क्या वाकई सिनेमा अब लोगों की पहली पसंद रहा? या फिर हमने खुद अपने हाथों से सिनेमा को गला दिया? ये सवाल अब हर फिल्ममेकर की नींद उड़ाए हुए है। आज हम इसी विषय पर गहराई में चर्चा करेंगे।

आपको बता दें कि कोरोनाकाल ने पूरी दुनिया को हिला दिया, लेकिन भारतीय फिल्म इंडस्ट्री के लिए यह किसी सुनामी से कम नहीं रहा। पहले सिनेमाघर बंद हुए, फिर शूटिंगें रुकीं और जो थोड़ा बहुत कंटेंट बचा था, वो सीधे OTT की झोली में चला गया। लेकिन जब लॉकडाउन खुला, और उम्मीद की लौ फिर से जगी, तो इंडस्ट्री को लगा कि अब हम फिर से उड़ान भरेंगे।

लेकिन हकीकत कुछ और ही थी। विजय किरागंदूर जैसे दिग्गज निर्माता, जिन्होंने KGF, कांतारा और सलार जैसी फिल्में दी हैं, वो भी अब कहते हैं कि इंडस्ट्री अपने सबसे मुश्किल दौर से गुजर रही है। अगर वो चिंता में हैं, तो सोचिए छोटे और मध्यम प्रोड्यूसर्स का क्या हाल होगा।

18,700 करोड़ रुपये की फिल्म इंडस्ट्री आज जिस हालत में है, उसमें सबसे बड़ा कारण है—सितारों की बेतहाशा बढ़ती फीस और OTT की अस्थिर नीतियां। पहले सितारों को फिल्म की आत्मा माना जाता था, लेकिन अब वही आत्मा निर्माता की कमर तोड़ रही है। साउथ के सुपरस्टार अल्लू अर्जुन ने पुष्पा 2 के लिए 300 करोड़ की फीस ली, जबकि पूरी फिल्म का बजट 450 करोड़ था। यानी फिल्म की लागत का लगभग दो-तिहाई हिस्सा सिर्फ एक इंसान को चला गया। और सिर्फ अल्लू अर्जुन ही नहीं, थलापथी विजय जैसे सितारे भी अब 250 करोड़ से ज्यादा मांग रहे हैं। इतने में तो कभी पूरी फिल्में बन जाती थीं।

बॉलीवुड के हालात भी कुछ खास बेहतर नहीं हैं। शाहरुख, सलमान और आमिर जैसे सितारे अब ‘प्रॉफिट शेयरिंग’ मॉडल पर काम कर रहे हैं। मतलब अगर फिल्म हिट होती है तो ये सितारे मोटा मुनाफा लेते हैं, और अगर फ्लॉप होती है तो नुकसान सिर्फ निर्माता का होता है।

यह एक तरह का रिवर्स इंश्योरेंस है—फायदा मिला तो हम भी हिस्सेदार, नुकसान हुआ तो आप अकेले भुगतो। और साउथ इंडस्ट्री में तो यह मॉडल है ही नहीं, वहां सीधी फीस दी जाती है, चाहे फिल्म चले या ना चले। ऐसे में निर्माताओं के लिए रिस्क और भी ज्यादा बढ़ जाता है। बाहुबली जैसी फिल्मों के निर्माता शोबू यारलगड्डा तक मानते हैं कि अब प्रोडक्शन लागत पूरी तरह नियंत्रण से बाहर हो चुकी है।

लेकिन इस तूफान की असली शुरुआत तो OTT से हुई थी। कोविड के दौर में जब थिएटर बंद थे और लोग घरों में कैद थे, तब नेटफ्लिक्स, अमेजन प्राइम और डिज्नी प्लस हॉटस्टार जैसे प्लेटफॉर्म्स निर्माता के लिए फरिश्ता बनकर आए। उन्होंने फिल्मों के डिजिटल राइट्स के लिए इतनी बड़ी रकम ऑफर की, जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। निर्माता तो मानो jackpot लगा समझ बैठे। लेकिन सितारों ने इस मौके को और भी ज़्यादा भुनाया। उन्होंने अपनी फीस को रातों-रात दोगुना-तिगुना कर दिया। सोचिए, अगर एक फिल्म के राइट्स 100 करोड़ में बिक रहे हैं और स्टार 70 से 80 करोड़ मांग रहा है, तो बचा क्या निर्माता के लिए?

समस्या यहीं नहीं रुकी। जैसे-जैसे OTT का बुलबुला फूटा, वैसे-वैसे इन प्लेटफॉर्म्स ने अपने खर्चों पर लगाम लगाना शुरू कर दिया। अब फिल्में पहले जैसी कीमत पर बिक नहीं रहीं। कई फिल्में तो बेची ही नहीं जा पा रहीं, और जो बिक रही हैं, उनके लिए अब सिर्फ सीमित बजट मिल रहा है। ऐसे में निर्माता अब न डिस्ट्रीब्यूटर के भरोसे हैं, न OTT के। वो अब फंसे हुए हैं एक ऐसे चक्रव्यूह में, जहां हर दिशा बंद है और हर रास्ता घाटे की ओर जाता है।

2024 में जब दुनिया धीरे-धीरे पटरी पर लौटी, तो उम्मीद थी कि सिनेमाघरों में फिर से रौनक लौटेगी। लेकिन FICCI-EY की रिपोर्ट ने सच्चाई का आईना दिखा दिया। 18,700 करोड़ की इंडस्ट्री में थिएटर की हिस्सेदारी अब घटती जा रही है। डिजिटल और सैटेलाइट का दबदबा बढ़ गया है। सिनेमाघरों में दर्शकों की संख्या लगातार घट रही है। लोग अब सोचते हैं—जब सब कुछ घर बैठे, एसी में, आराम से मिल सकता है, तो टिकट खरीदकर, पॉपकॉर्न के दाम सुनकर क्यों जाएं थिएटर?

2025 भी कोई खास राहत लेकर नहीं आया। अब तक केवल सात फिल्में ही बॉक्स ऑफिस पर सुपरहिट रही हैं। इनमें से कुछ नाम हैं—हाउसफुल 5, छावा, रेड 2, सितारे जमीं पर, संक्रांति की वस्तुनम, थुडारम और L2: एम्पुरान। लेकिन दूसरी ओर, ‘गेम चेंजर’ जैसी फिल्म, जिसमें राम चरण और डायरेक्टर एस शंकर जैसे बड़े नाम थे, वो बुरी तरह फ्लॉप हो गई। यहां तक कि इसके कलेक्शन को भी बढ़ा-चढ़ाकर बताया गया, ताकि स्टारडम को बचाया जा सके। लेकिन जनता को अब इन झूठे आंकड़ों से कोई फर्क नहीं पड़ता—उसे चाहिए सिर्फ एक दमदार कहानी।

आमिर खान की ‘सितारे जमीं पर’ इसका बेहतरीन उदाहरण है। 90 करोड़ के बजट में बनी इस फिल्म ने बिना किसी ग्लैमर या भारी-भरकम प्रमोशन के 160 करोड़ से ज्यादा की कमाई की। आमिर ने बतौर निर्माता अपनी फीस भी नहीं ली। और सबसे दिलचस्प बात यह कि डिजिटल और सैटेलाइट राइट्स अभी तक बेचे नहीं हैं। उन्हें एक OTT से 120 करोड़ का ऑफर आया है, लेकिन आमिर सोच रहे हैं कि क्यों न यूट्यूब पर पे-पर-व्यू मॉडल लाया जाए। अगर यह मॉडल सफल होता है, तो यह पूरे OTT बाजार के लिए भूचाल बन सकता है।

अब सवाल यह है कि क्या इंडस्ट्री को पुराने ढर्रे से बाहर निकलना चाहिए? इसका जवाब ज़ोरदार “हां” है। कई निर्माता अब कह रहे हैं कि स्टार्स की फीस पूरी तरह फिक्स न हो, बल्कि एक बेसिक अमाउंट के साथ मुनाफे में हिस्सा दिया जाए। इससे फिल्म फ्लॉप होने पर सारा बोझ सिर्फ निर्माता पर नहीं पड़ेगा। इस मॉडल में हर कोई ज़िम्मेदार होगा—स्टार्स, डायरेक्टर और टेक्नीशियन तक। साथ ही इससे प्रोडक्शन का बजट भी नियंत्रण में रहेगा और दर्शकों को बेहतर कंटेंट मिलेगा।

कर्नाटक सरकार ने एक साहसी कदम उठाया है—उन्होंने टिकट की अधिकतम कीमत टैक्स समेत 200 रुपये तय करने का प्रस्ताव रखा है। इससे आम दर्शक को थिएटर का अनुभव सस्ता मिलेगा, लेकिन PVR-INOX जैसे थिएटर मालिकों की कमाई घट सकती है। यह एक ऐसा फैसला है जो लंबे समय में इंडस्ट्री के लिए फायदेमंद साबित हो सकता है। क्योंकि अगर दर्शक वापस थिएटर में आएंगे, तभी तो इंडस्ट्री दोबारा सांस ले पाएगी।

और फिर आती है ‘सैयार’ जैसी फिल्मों की बात—जो उम्मीद की असली किरण हैं। ना कोई बड़ा नाम, ना ही भारी-भरकम प्रमोशन, लेकिन फिर भी फिल्म ने सिर्फ चार दिन में 100 करोड़ की कमाई कर ली। यशराज की इस फिल्म में दो नए चेहरे—अहान पांडे और अनीत पड्डा—अपने पहले ही प्रयास में 100 करोड़ क्लब में शामिल हो गए। वजह सिर्फ एक—कहानी। फिल्म की स्क्रिप्ट इतनी दमदार थी कि लोगों ने खुद थिएटर जाकर टिकट खरीदा।

तो अब तस्वीर बिल्कुल साफ है। दर्शक अब सिर्फ चमक-धमक नहीं देखना चाहता, वो गहराई चाहता है। वो कहानियां चाहता है जो उसके दिल को छू जाएं। आज का दर्शक परिपक्व हो गया है, वो किसी के नाम से नहीं, फिल्म की आत्मा से जुड़ता है। और अगर फिल्म उसे झकझोर सके, तो वो उसका साथ नहीं छोड़ता। अब वक्त है कि फिल्म इंडस्ट्री एकजुट हो। सब मिलकर ऐसा मॉडल बनाए जिसमें न सिर्फ कमाई हो, बल्कि ज़िम्मेदारी भी साझा हो। क्योंकि आज दर्शकों के पास विकल्प बहुत हैं—OTT, यूट्यूब, मोबाइल कंटेंट—अगर थिएटर को ज़िंदा रखना है, तो उसे दिल से जोड़ना होगा।

Conclusion

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