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Investment की उम्मीदें और Ethanol का भविष्य: बिहार के 17 प्लांट, किसान और एक पॉलिसी की असली कहानी I

Investment

कभी-कभी किसी राज्य का भविष्य किसी फैक्ट्री की चिमनी से नहीं, बल्कि दिल्ली की किसी फाइल से तय हो जाता है। बिहार में इन दिनों कुछ ऐसा ही माहौल है। बाहर से देखने पर सब कुछ सामान्य लगता है—सरकार Investment बुला रही है, नीतियां बन रही हैं, भाषणों में विकास की बातें हो रही हैं। लेकिन ज़मीनी हकीकत कुछ और कहानी कह रही है। बिहार के Ethanol प्लांट्स में मशीनें धीमी हो रही हैं, किसानों के गोदामों में मक्का पड़ा है, और उद्योगपति रोज़ एक ही सवाल पूछ रहे हैं—क्या हमने भरोसा करके गलती कर दी?

पिछले कुछ सालों में बिहार ने औद्योगिक विकास को लेकर एक नई पहचान बनाने की कोशिश की थी। स्टार्टअप पॉलिसी, इंडस्ट्रियल इंसेंटिव पॉलिसी, Investors को सब्सिडी, जमीन और टैक्स में छूट—सब कुछ इस इरादे से किया गया कि बिहार सिर्फ़ मजदूर देने वाला राज्य न रहे, बल्कि उत्पादन और उद्योग का केंद्र बने। खासकर एथेनॉल सेक्टर को लेकर एक नई उम्मीद जगी थी। किसान-प्रधान राज्य होने के नाते यह सेक्टर बिहार के लिए गेम-चेंजर माना जा रहा था।

Ethanol नीति का मकसद साफ था। पेट्रोल में इथेनॉल मिलाकर तेल Import पर निर्भरता घटाना, पर्यावरण को सुरक्षित करना और किसानों को उनकी फसलों का बेहतर दाम देना। बिहार जैसे राज्य में, जहां मक्का और धान की पैदावार अच्छी होती है, एथेनॉल प्लांट्स ने किसानों की जिंदगी में सीधा असर डाला। मक्का, जो कभी 12 हजार रुपये टन बिकता था, एथेनॉल की मांग बढ़ने के बाद 26 हजार रुपये टन तक पहुंच गया। गांवों में पैसे का फ्लो बढ़ा, किसानों को लगा कि अब उनकी फसल का भविष्य सुरक्षित है।

इसी भरोसे पर बिहार में 17 Ethanol प्लांट लगाए गए। इनमें से कई डेडिकेटेड एथेनॉल प्लांट थे, यानी उनका पूरा बिजनेस मॉडल इसी पर टिका था कि, ऑयल मार्केटिंग कंपनियां उनका पूरा उत्पादन खरीदेंगी। केंद्र और बिहार सरकार के बीच 2,022 के आसपास जो समझौते हुए, उनमें यह साफ था कि 100 प्रतिशत उत्पादन की खरीद होगी। इसी भरोसे पर 200 करोड़ रुपये तक का Investment किया गया। मशीनें लगीं, मजदूर रखे गए, सप्लाई चेन बनी।

लेकिन सितंबर में आई एक पॉलिसी बदलाव ने पूरा समीकरण बिगाड़ दिया। केंद्र सरकार की नई Ethanol पॉलिसी के तहत, ऑयल मार्केटिंग कंपनियों को निर्देश दिया गया कि वे बिहार से सिर्फ़ 50 प्रतिशत एथेनॉल ही खरीदेंगी। बाकी 50 प्रतिशत का इंतजाम दूसरे राज्यों और खासकर एफसीआई के चावल से बनने वाले एथेनॉल से किया जाएगा। कागज पर यह एक छोटा सा बदलाव था, लेकिन बिहार के लिए यह किसी झटके से कम नहीं था।

अब हालात यह हैं कि बिहार में सालाना 84 करोड़ लीटर Ethanol बनाने की क्षमता है, लेकिन इस साल के लिए सिर्फ़ 44 करोड़ लीटर की खरीद का ही ऑर्डर मिला है। यानी आधे से भी कम। नवंबर 2025 से कई प्लांट्स को साफ कह दिया गया कि अब वे सिर्फ़ आधा ही उत्पादन सप्लाई कर पाएंगे। बाकी एथेनॉल चाहे बनाइए या न बनाइए, खरीदार नहीं है। ऐसे में सवाल उठता है—कोई फैक्ट्री आधी क्षमता पर कैसे चलेगी?

उद्योग में एक नियम होता है—फिक्स्ड कॉस्ट। मशीनें लगी हैं, कर्मचारी हैं, बिजली, मेंटेनेंस, लोन की EMI है। फैक्ट्री आधी चले या पूरी, खर्च लगभग उतना ही रहता है। ऐसे में जब बिक्री आधी हो जाए, तो मुनाफा तो दूर, सर्वाइव करना भी मुश्किल हो जाता है। यही वजह है कि आज बिहार के 17 में से करीब 11 एथेनॉल प्लांट गंभीर संकट में हैं। कुछ ने उत्पादन आधा कर दिया है, कुछ बंद होने की कगार पर हैं।

इसका सीधा असर किसानों पर दिख रहा है। नवंबर 2,024 से अक्टूबर 2,025 के बीच बिहार के Ethanol प्लांट्स ने करीब 49,500 टन मक्का खरीदा था। लेकिन नवंबर 2,025 से अक्टूबर 2,026 के लिए यह खरीद घटकर सिर्फ़ 14,640 टन रहने वाली है। यानी लगभग 70 प्रतिशत की गिरावट। इसका मतलब साफ है—किसानों का मक्का अब खरीदने वाला कोई नहीं है।

मक्का का भाव, जो कभी 26 हजार रुपये टन तक पहुंच गया था, अब गिरकर 19 हजार रुपये टन पर आ गया है। MSP की बात तो दूर, कई किसानों के लिए लागत निकालना भी मुश्किल हो गया है। गांवों में वही पुरानी चिंता लौट आई है—फसल उगाई, लेकिन खरीदार नहीं मिला। जो Ethanol नीति किसानों के लिए वरदान मानी जा रही थी, वही अब बोझ बनती दिख रही है।

प्लांट मालिकों का दर्द भी कम नहीं है। भारत प्लस एथेनॉल्स प्राइवेट लिमिटेड के CMD अजय सिंह खुलकर कहते हैं कि, उन्हें कभी अंदाजा नहीं था कि सरकार अचानक कोटा काट देगी। उनका कहना है कि वे डेडिकेटेड एथेनॉल प्लांट हैं। उनका पूरा बिजनेस इसी भरोसे पर था कि सरकार और OMCs उनके साथ किए गए एग्रीमेंट का पालन करेंगी। लेकिन अचानक फैसला हुआ और 400 करोड़ लीटर का कोटा शुगर मिलों को दे दिया गया।

अजय सिंह का कहना है कि एक Ethanol प्लांट खोलने में, 200 करोड़ रुपये से ज्यादा का Investment होता है। अगर फैक्ट्री महीने में सिर्फ़ 15 दिन चलेगी, तो कोई भी बिजनेस कैसे बचेगा? पिछले दो महीनों से उत्पादन आधा हो चुका है, लेकिन खर्च वही है। मजदूरों की सैलरी, बिजली का बिल, बैंक का ब्याज—सब कुछ चलता रहता है। ऐसे में उद्योगपति पूछ रहे हैं कि क्या सरकार चाहती है कि ये प्लांट बंद हो जाएं?

कंपनियों ने केंद्र सरकार को पत्र लिखे हैं। प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री दोनों को इस मुद्दे पर अवगत कराया गया है। उनकी एक ही मांग है—2,022 में जो समझौता हुआ था, उसी के अनुसार खरीद सुनिश्चित की जाए। उनका तर्क है कि बिहार जैसे राज्य में, जहां पहले ही उद्योगों की कमी है, वहां पॉलिसी बनाते समय अलग नजरिया अपनाया जाना चाहिए।

बिहार सरकार खुद भी असहज स्थिति में है। 2,021 में राज्य सरकार ने एथेनॉल उत्पादन प्रोत्साहन नीति लाई थी। Investors को आकर्षित करने के लिए पहले आओ पहले पाओ की नीति अपनाई गई। स्टांप ड्यूटी और रजिस्ट्रेशन फीस में 100 प्रतिशत छूट, भूमि परिवर्तन शुल्क में छूट, टर्म लोन पर ब्याज अनुदान—कई बड़े प्रलोभन दिए गए। सरकार ने भरोसा दिलाया था कि बिहार Ethanol हब बनेगा।

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और तत्कालीन उद्योग मंत्री शाहनवाज हुसैन ने खुले मंच से कहा था कि, एथेनॉल से बिहार में रोजगार बढ़ेगा और किसान मजबूत होंगे। लेकिन अब वही Investors सरकार से सवाल पूछ रहे हैं। उनका कहना है कि अगर केंद्र सरकार की नीति ऐसी ही रही, तो बिहार में कोई नया Investment क्यों करेगा? राजनीति भी इस मुद्दे पर गर्म होने लगी है। राजद विधायक गौतम कृष्ण ने कहा है कि बिहार में Ethanol सेक्टर में अपार संभावनाएं हैं। अगर इस तरह की नीति से फैक्ट्री बंद होने की नौबत आ रही है, तो यह बेहद चिंताजनक है। सरकार को इस पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।

बिहार के उद्योग मंत्री दिलीप जायसवाल भी मानते हैं कि Ethanol उद्योग संकट में है। उनका कहना है कि नई पॉलिसी के कारण आधा प्रोडक्शन ही खरीदा जा रहा है, जिससे कंपनियां बंद होने की कगार पर पहुंच गई हैं। उन्होंने यह भी कहा कि बिहार सरकार केंद्र से बात करेगी और इस मुद्दे को उठाएगी, ताकि फैक्ट्रियां बच सकें और रोजगार बना रहे।

सरकार की एक बड़ी मांग यह है कि पेट्रोल में Ethanol की मात्रा 20 प्रतिशत से बढ़ाकर 22 या 25 प्रतिशत की जाए। इससे एथेनॉल की मांग बढ़ेगी, कंपनियों को राहत मिलेगी और पर्यावरण को भी फायदा होगा। बिहार सरकार का दावा है कि इस पर केंद्र सरकार विचार कर रही है और जल्द ही इस मुद्दे पर बैठक होने वाली है।

लेकिन सवाल यह है कि क्या सिर्फ़ बैठक से हालात बदल जाएंगे? उद्योग में भरोसा सबसे बड़ी चीज होती है। एक बार अगर Investors को लगे कि पॉलिसी कभी भी बदल सकती है, तो वे पैसा लगाने से पहले दस बार सोचेंगे। बिहार, जो धीरे-धीरे औद्योगिक नक्शे पर उभर रहा था, कहीं फिर से पीछे न छूट जाए—यही डर आज हर Investor और किसान के मन में है।

एथेनॉल सिर्फ़ एक उद्योग नहीं है। यह किसानों, मजदूरों, ट्रांसपोर्टर्स, टेक्नीशियनों—एक पूरे इकोसिस्टम को जोड़ता है। अगर 60 प्रतिशत एथेनॉल कंपनियां बंद हो जाती हैं, तो इसका असर सिर्फ फैक्ट्री गेट तक सीमित नहीं रहेगा। यह गांवों तक जाएगा, खेतों तक जाएगा, और उन परिवारों तक जाएगा, जिनकी उम्मीदें इस सेक्टर से जुड़ी थीं।

आने वाले कुछ महीने तय करेंगे कि बिहार Ethanol हब बनेगा, या फिर यह कहानी भी उन अधूरी औद्योगिक कोशिशों में शामिल हो जाएगी, जिनका ज़िक्र सिर्फ़ फाइलों और भाषणों में होता है। फिलहाल, सबकी नजरें दिल्ली की अगली बैठक पर टिकी हैं। क्योंकि कभी-कभी एक फैसला सिर्फ़ नीति नहीं बदलता, एक राज्य की दिशा बदल देता है।

Conclusion

एक फैसले ने बिहार के पूरे उद्योग की नींव हिला दी है। जिन एथेनॉल प्लांट्स को कल तक विकास और रोज़गार की उम्मीद माना जा रहा था, आज वही बंद होने के कगार पर खड़े हैं। सवाल उठ रहा है—क्या बिहार का एथेनॉल सपना टूट रहा है? केंद्र सरकार की नई एथेनॉल नीति के तहत अब बिहार से सिर्फ 50% उत्पादन ही खरीदा जाएगा। नतीजा यह हुआ कि 84 करोड़ लीटर उत्पादन वाले राज्य को सिर्फ 44 करोड़ लीटर का ऑर्डर मिला।

असर सीधा पड़ा—17 में से ज़्यादातर प्लांट्स घाटे में चले गए, मक्का किसानों की मांग गिरी और कीमतें टूट गईं। जहां कभी मक्का किसानों की आमदनी दोगुनी हुई थी, आज लागत निकालना मुश्किल है। कंपनियों का कहना है कि सैकड़ों करोड़ का Investment अब डूबने की कगार पर है। राज्य सरकार केंद्र से राहत की मांग कर रही है। अब निगाहें इसी पर हैं—क्या नीति बदलेगी, या बिहार का एथेनॉल भविष्य अधर में ही रहेगा?

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