कभी-कभी इतिहास किताबों में नहीं लिखा जाता, वह किसी अस्पताल के गलियारे में, किसी टूटती हुई सांस के साथ जन्म लेता है। एक ऐसा पल, जब डॉक्टर के पास ज्ञान होता है, इच्छा होती है, लेकिन सिस्टम साथ नहीं देता। साल था 1,979। भारत में एक मरीज दिल की गंभीर बीमारी से जूझ रहा था। हालत बिगड़ती जा रही थी। इलाज चाहिए था, वो भी तुरंत।
डॉक्टर ने कहा—अगर जान बचानी है, तो अमेरिका ले जाना होगा। लेकिन अमेरिका जाना सबके बस की बात नहीं थी। वक्त कम था, संसाधन सीमित थे। और कुछ ही समय बाद वह मरीज इस दुनिया से चला गया। उस एक मौत ने सिर्फ एक परिवार नहीं तोड़ा, उसने भारत की हेल्थकेयर व्यवस्था के सामने एक आईना रख दिया। और उसी आईने में देखकर एक आदमी ने अपनी पूरी ज़िंदगी की दिशा बदल दी।
उस वक्त डॉक्टर प्रताप चंद्र रेड्डी अमेरिका में थे। एक सफल कार्डियोलॉजिस्ट। प्रोफेशनली सेटल्ड। अच्छी कमाई, सम्मान, सुरक्षित भविष्य। उम्र करीब 50 साल। वो उम्र, जब ज़्यादातर लोग अपनी ज़िंदगी को सुरक्षित दायरे में समेटने लगते हैं। लेकिन उस मरीज की मौत डॉक्टर रेड्डी के भीतर कुछ ऐसा जगा गई, जो उन्हें चैन से बैठने नहीं दे रहा था। यह सिर्फ एक मेडिकल केस नहीं था, यह एक सिस्टम फेलियर था। एक ऐसा देश, जहां टैलेंट था, डॉक्टर थे, लेकिन सुविधाएं नहीं थीं। जहां जान बचाने के लिए सीमा पार करनी पड़ती थी।
1,970 और 1,980 के दशक का भारत आज के भारत से बिल्कुल अलग था। हरित क्रांति ने खेती को बदला जरूर था, लेकिन हेल्थकेयर अब भी पिछड़ा हुआ था। सरकारी अस्पतालों में भीड़ थी, संसाधन सीमित थे। प्राइवेट अस्पताल छोटे और बिखरे हुए थे। हार्ट सर्जरी, न्यूरो सर्जरी या ट्रांसप्लांट जैसी चीजें आम आदमी के लिए लगभग असंभव थीं। दिल की बीमारी का मतलब था लंबा इंतज़ार या विदेश का टिकट। उस दौर में हेल्थकेयर एक सेवा जरूर थी, लेकिन सिस्टम के तौर पर मौजूद नहीं थी।
डॉक्टर रेड्डी ने वहीं अमेरिका में बैठकर खुद से एक सवाल पूछा—अगर भारत में इलाज नहीं है, तो क्या हमेशा मरीजों को बाहर भेजते रहेंगे? या फिर इलाज को भारत लाया जा सकता है? यही सवाल Apollo की नींव बना। उन्होंने तय कर लिया कि वह भारत लौटेंगे और यहां एक ऐसा अस्पताल बनाएंगे, जो दुनिया के किसी भी बड़े अस्पताल से कम न हो। यह फैसला भावनात्मक था, लेकिन इसके नतीजे पूरी तरह अनिश्चित थे। न सरकार का भरोसा, न बैंक का समर्थन, न कोई मिसाल।
जब डॉक्टर रेड्डी भारत लौटे, तो हकीकत ने उनका स्वागत बेहद सख्ती से किया। वर्ल्ड-क्लास अस्पताल खोलना उस समय लगभग असंभव मिशन माना जाता था। बैंक लोन देने से कतराते थे। मेडिकल इक्विपमेंट इम्पोर्ट करने पर 100% तक टैक्स लगता था। लाइसेंस, परमिशन, सरकारी फाइलें—हर कदम पर अड़चन। लोग कहते थे—भारत में प्राइवेट मल्टी-स्पेशलिटी हॉस्पिटल नहीं चल सकता। लोग इलाज के लिए पैसा नहीं देंगे। लेकिन डॉक्टर रेड्डी को भरोसा था कि अगर भरोसेमंद इलाज मिलेगा, तो लोग आएंगे।
कहा जाता है कि उन्होंने दिल्ली के 50 से ज़्यादा चक्कर लगाए। हर बार वही फाइल, वही दलील—भारत को आधुनिक अस्पताल चाहिए। यह लड़ाई सिर्फ एक अस्पताल के लिए नहीं थी, यह उस सोच के खिलाफ थी, जो मानती थी कि हेल्थकेयर में इनोवेशन संभव नहीं है। और फिर 1,983 में एक बड़ा मोड़ आया। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का समर्थन मिला। चेन्नई में 150 बेड वाला पहला Apollo हॉस्पिटल शुरू हुआ। उस दिन भारत में कॉर्पोरेट हेल्थकेयर का जन्म हुआ।
उस समय लोग हैरान थे। अस्पताल को बिज़नेस की तरह चलाने का आइडिया नया था। कई लोगों ने डॉक्टर रेड्डी को पागल तक कहा। खुद डॉक्टर रेड्डी ने बाद में कहा था कि जब उन्होंने लोगों को बताया कि वह मल्टी-स्पेशलिटी हॉस्पिटल खोलने जा रहे हैं, तो ज़्यादातर लोगों ने उनका मज़ाक उड़ाया। लेकिन वही अविश्वास उनकी ताकत बन गया। क्योंकि उन्होंने साबित करना था कि भारत में भी वर्ल्ड-क्लास इलाज संभव है।
डॉक्टर प्रताप चंद्र रेड्डी की जड़ें बेहद साधारण थीं। उनका जन्म 5 फरवरी 1,933 को तमिलनाडु के अराकोंडा में हुआ। वह अपने परिवार में कॉलेज जाने वाले पहले व्यक्ति थे। उनके पिता चाहते थे कि वह MBA करें और सुरक्षित कॉर्पोरेट करियर चुनें। लेकिन रेड्डी साहब का मन मेडिसिन में था। उन्होंने स्टेनली मेडिकल कॉलेज से MBBS किया, फिर UK जाकर कार्डियोलॉजी में ट्रेनिंग ली।
बाद में अमेरिका पहुंचे, जहां उन्होंने बेहतरीन प्रोफेशनल पहचान बनाई। लेकिन भारत उनके भीतर हमेशा ज़िंदा रहा। 1,971 में परिवार से आए एक खत ने उन्हें झकझोर दिया। भारत की हालत, इलाज की कमी, लोगों की मजबूरी—इन सबने उनके भीतर का डॉक्टर फिर से जगा दिया। और आखिरकार 1,979 की उस मौत ने उनके फैसले को अंतिम रूप दे दिया। उन्होंने तय किया कि अब सिर्फ इलाज करना काफी नहीं है, सिस्टम बनाना ज़रूरी है।
Apollo नाम भी अपने आप में एक कहानी है। यह नाम किसी ब्रांडिंग कंसल्टेंट ने नहीं, बल्कि उनकी दूसरी बेटी सुनीता रेड्डी ने सुझाया था। ग्रीक माइथोलॉजी में अपोलो स्वास्थ्य और चिकित्सा के देवता माने जाते हैं। यह नाम सिर्फ अलग नहीं था, बल्कि एक संदेश था—इलाज सिर्फ दवा नहीं, भरोसा भी है। यही भरोसा धीरे-धीरे अपोलो की पहचान बन गया।
पहले अस्पताल के बाद Apollo की यात्रा आसान नहीं थी। हर नई टेक्नोलॉजी भारत लाना चुनौती था। विदेशी डॉक्टरों को बुलाना, भारतीय डॉक्टरों को ट्रेन करना, इंटरनेशनल स्टैंडर्ड्स लागू करना—सब कुछ धीरे-धीरे हुआ। लेकिन Apollo ने यह मिथ तोड़ दिया कि अच्छा इलाज सिर्फ विदेश में ही संभव है। पहली सफल हार्ट सर्जरी, ट्रांसप्लांट, एडवांस डायग्नोस्टिक्स—हर सफलता के साथ अपोलो का भरोसा बढ़ता गया।
समय के साथ Apollo सिर्फ अस्पतालों तक सीमित नहीं रहा। फार्मेसी चेन शुरू हुई, ताकि दवाएं हर जगह उपलब्ध हों। डायग्नोस्टिक सेंटर बने। टेलीमेडिसिन की शुरुआत हुई। एक पूरा हेल्थकेयर इकोसिस्टम खड़ा किया गया। आज अपोलो हॉस्पिटल्स एंटरप्राइज के पास 72 हॉस्पिटल्स हैं, 6,000 से ज्यादा फार्मेसी हैं और लाखों मरीज हर साल इलाज कराते हैं।
मेडिकल टूरिज्म में भारत को ग्लोबल मैप पर लाने में Apollo की भूमिका बेहद अहम रही है। डॉक्टर रेड्डी के योगदान को देश ने भी पहचाना। 1,991 में उन्हें पद्म भूषण मिला। 2,010 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। लेकिन उनके लिए सबसे बड़ा सम्मान वो मरीज हैं, जिनकी जान भारत में बच सकी। वो परिवार, जिन्हें विदेश नहीं जाना पड़ा। वो डॉक्टर, जिन्हें आधुनिक तकनीक के साथ काम करने का मौका मिला।
आज डॉक्टर प्रताप चंद्र रेड्डी 92 साल के हैं। और वह भारत के सबसे बुजुर्ग अरबपतियों में गिने जाते हैं। फोर्ब्स के अनुसार उनकी नेटवर्थ करीब 3.4 बिलियन डॉलर है। लेकिन उनकी कहानी अमीरी की नहीं है। यह कहानी उस फैसले की है, जो तब लिया गया, जब दुनिया कहती है—अब बहुत देर हो चुकी है।
आज Apollo का साम्राज्य उनकी चार बेटियों के हाथ में है। प्रीथा रेड्डी और शोभना रेड्डी चेयरपर्सनशिप की जिम्मेदारी संभालती हैं। सुनीता रेड्डी मैनेजिंग डायरेक्टर हैं। संगीता रेड्डी जॉइंट मैनेजिंग डायरेक्टर हैं। चारों बेटियां मिलकर एक ऐसे सेक्टर का नेतृत्व कर रही हैं, जिसे कभी पुरुषों का क्षेत्र माना जाता था। यह सिर्फ सक्सेशन स्टोरी नहीं, बल्कि भारतीय कॉर्पोरेट दुनिया में महिला नेतृत्व की मजबूत मिसाल है।
आज Apollo Hospitals Enterprise Limited का मार्केट कैप एक लाख करोड़ रुपये से ज्यादा है। डिजिटल हेल्थ, AI-based डायग्नोस्टिक्स, रिमोट केयर—Apollo लगातार खुद को बदल रहा है। लेकिन उसकी आत्मा वही है—हर मरीज को बेहतर इलाज देना, चाहे उसकी आर्थिक स्थिति कुछ भी हो। इस कहानी का सबसे बड़ा सबक यही है कि शुरुआत कभी देर से नहीं होती। 50 की उम्र में बिज़नेस शुरू करना, वो भी ऐसे सेक्टर में जहां पूंजी, नीति और सिस्टम तीनों चुनौती हों—यह सिर्फ साहस नहीं, बल्कि जुनून की मिसाल है। डॉक्टर रेड्डी ने यह साबित किया कि उम्र एक सीमा नहीं, बल्कि अनुभव का नाम है।
आज जब हम किसी मल्टी-स्पेशलिटी हॉस्पिटल में इलाज कराते हैं, शायद हम यह नहीं सोचते कि इसके पीछे कितनी लड़ाइयां लड़ी गई होंगी। Apollo सिर्फ एक ब्रांड नहीं है। यह उस सवाल का जवाब है, जो 1,979 में एक मौत ने खड़ा किया था। और शायद इसी वजह से यह कहानी सिर्फ हेल्थकेयर की नहीं, बल्कि उम्मीद की है। उस उम्मीद की, जो एक इंसान के फैसले से शुरू हुई… और पूरे देश की सेहत की परिभाषा बदल गई।
Conclusion
एक मरीज की मौत… और 50 साल की उम्र में लिया गया ऐसा फैसला, जिसने भारत की हेल्थकेयर की तस्वीर बदल दी। अमेरिका में सेटल, सुरक्षित ज़िंदगी छोड़कर एक डॉक्टर भारत लौटता है—क्योंकि उसे लगा कि इलाज की कमी से किसी की जान नहीं जानी चाहिए। यही मोड़ बना Apollo Hospitals की शुरुआत। 1,979 में एक हार्ट पेशेंट सही इलाज न मिलने से मर गया। इस घटना ने डॉक्टर प्रताप चंद्र रेड्डी को झकझोर दिया। भारी टैक्स, बैंक लोन की दिक्कतें और तानों के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी। 1983 में चेन्नई में पहला Apollo हॉस्पिटल खुला और भारत में कॉर्पोरेट हेल्थकेयर की नींव पड़ी।
आज 92 साल की उम्र में डॉक्टर रेड्डी देश के सबसे बुजुर्ग अरबपतियों में हैं। 72 अस्पताल, हजारों फार्मेसियां और अब पूरा साम्राज्य उनकी चार बेटियां संभाल रही हैं। यह कहानी सिर्फ बिज़नेस की नहीं, मिशन की है। अगर हमारे आर्टिकल ने आपको कुछ नया सिखाया हो, तो इसे शेयर करना न भूलें, ताकि यह महत्वपूर्ण जानकारी और लोगों तक पहुँच सके। आपके सुझाव और सवाल हमारे लिए बेहद अहम हैं, इसलिए उन्हें कमेंट सेक्शन में जरूर साझा करें। आपकी प्रतिक्रियाएं हमें बेहतर बनाने में मदद करती हैं।
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